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FIR के बाद समझौता कब करवा सकता है केस रद्द? जानिए कानून क्या कहता है

Published on: February 9, 2026
When will the settlement be done after FIR

द देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली : एक बार एफआईआर दर्ज हो जाने के बाद यह जरूरी नहीं कि शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच समझौता होते ही हर मामले में केस वापस हो जाए। कानून के मुताबिक, केवल कुछ खास किस्म के मामलों में ही आपसी समझौते के आधार पर केस खत्म किया जा सकता है। कई मामलों में इसके लिए हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी जरूरी होती है।

किन मामलों में आपसी समझौते से केस वापस हो सकता है?

ऐसे मामलों को समझौतावादी (Compoundable Offence) कहा जाता है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 359 और पहले की सीआरपीसी की धारा 320 में इन अपराधों की सूची दी गई है।

  • आमतौर पर तीन साल तक की सजा वाले मामूली अपराध (कुछ अपवादों को छोड़कर) समझौतावादी होते हैं।

  • आपराधिक मानहानि, रास्ता रोकना, साधारण मारपीट जैसे मामले इसी श्रेणी में आते हैं।

  • ऐसे मामलों में यदि शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच आपसी सहमति बन जाए, तो निचली अदालत में धारा 359 के तहत अर्जी देकर केस रद्द कराने की मांग की जा सकती है।

  • कोर्ट दोनों पक्षों से यह सुनिश्चित करती है कि समझौता बिना किसी दबाव के हुआ है। संतुष्ट होने पर अदालत केस खत्म करने का आदेश दे देती है।

कब जरूरी होती है हाई कोर्ट की मंजूरी?

गैर-समझौतावादी (Non-Compoundable Offence) मामलों में सिर्फ आपसी सहमति से केस वापस नहीं लिया जा सकता।

  • हालांकि, कुछ गैर-समझौतावादी मामलों में यदि दोनों पक्षों में समझौता हो जाए, तो हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की जाती है।

  • गैर-इरादतन हत्या की कोशिश, जालसाजी, दहेज उत्पीड़न जैसे मामलों में संवैधानिक अदालतें परिस्थितियों को देखकर केस रद्द कर सकती हैं।

  • अदालत तभी राहत देती है, जब उसे लगे कि समझौते से न्याय के हित प्रभावित नहीं होंगे।

किन मामलों में समझौते से भी केस रद्द नहीं होता?

कुछ अपराध इतने गंभीर माने जाते हैं कि उनमें समझौते का कोई महत्व नहीं होता, जैसे—

  • हत्या

  • बलात्कार

  • देश के खिलाफ युद्ध

  • ड्रग्स से जुड़े गंभीर अपराध

  • महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराध

सुप्रीम कोर्ट ने 2012 के ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले में साफ किया था कि रेप, डकैती और मर्डर जैसे अपराधों में समझौते के आधार पर केस रद्द नहीं किए जा सकते। एफआईआर के बाद समझौता तभी कारगर होता है, जब मामला कानून की नजर में मामूली और समझौतावादी हो। गंभीर अपराधों में न तो आपसी सहमति काम आती है और न ही केस रद्द होने की गुंजाइश रहती है।


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