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‘इस्लामिक NATO’ में मिस्र को शामिल नहीं करना चाहता सऊदी अरब, तुर्की की कोशिशों पर लगा ब्रेक; जानिए क्यों

Published on: August 13, 2026
Egypt in ‘Islamic NATO’

द  देवरिया न्यूज़,रियाद। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट को लेकर अब एक नया विवाद सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस रक्षा समझौते में मिस्र को शामिल किए जाने पर भी चर्चा हुई थी, लेकिन सऊदी अरब इसके लिए तैयार नहीं हुआ। बताया जा रहा है कि तुर्की चाहता था कि मिस्र भी इस समझौते का हिस्सा बने, जबकि रियाद ने फिलहाल इस प्रस्ताव का विरोध किया।

7 अगस्त को मक्का में तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के नेताओं ने इस रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते के तहत किसी एक सदस्य देश पर हमला होने की स्थिति में उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इसी वजह से इसे ‘इस्लामिक NATO’ की संज्ञा दी जा रही है।

मिस्र को शामिल करना चाहता था तुर्की

मिडिल ईस्ट आई ने मामले की जानकारी रखने वाले तीन सऊदी सूत्रों के हवाले से बताया कि तुर्की ने मिस्र को मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट में शामिल करने की कोशिश की थी। हालांकि, सऊदी अरब ने इस प्रस्ताव का विरोध किया।

तुर्की के विदेश मंत्री हकान फिदान पहले ही कह चुके हैं कि मिस्र उनके देश के लिए एक स्वाभाविक साझेदार है। उनका संकेत था कि तकनीकी और अन्य अड़चनें दूर होने के बाद काहिरा भविष्य में इस व्यवस्था का हिस्सा बन सकता है। लेकिन फिलहाल सऊदी की सहमति नहीं मिलने से मिस्र की एंट्री का रास्ता बंद नजर आ रहा है।

सऊदी-मिस्र के रिश्तों में क्यों आई दूरी?

रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब और मिस्र के बीच पिछले कुछ समय से कई रणनीतिक मुद्दों को लेकर मतभेद बढ़े हैं। सऊदी अरब ने 2013 में अब्देल फतह अल-सीसी के सत्ता में आने के बाद मिस्र को बड़े पैमाने पर आर्थिक और वित्तीय सहायता दी थी। हालांकि, बाद में रियाद को लगा कि महत्वपूर्ण सुरक्षा और क्षेत्रीय मुद्दों पर काहिरा से उसे अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है।

सऊदी सूत्रों ने यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ अभियान के दौरान मिस्र की सीमित भूमिका और क्षेत्रीय सुरक्षा मामलों में उसके रुख को भी असंतोष की वजह बताया है। इसके अलावा ईरान को लेकर क्षेत्रीय तनाव के दौरान मिस्र के रुख से भी रियाद पूरी तरह संतुष्ट नहीं बताया जा रहा है।

UAE से मिस्र की नजदीकी भी बनी वजह?

सऊदी अरब की नाराजगी की एक वजह मिस्र और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच बढ़ती नजदीकी को भी माना जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, अबू धाबी के साथ काहिरा के लगातार मजबूत होते संबंधों ने सऊदी नेतृत्व के बीच मिस्र की रणनीतिक विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

एक पूर्व वरिष्ठ सऊदी सलाहकार के मुताबिक, मिस्र लंबे समय से सऊदी अरब, अमेरिका और अन्य सहयोगियों पर निर्भर रहा है, लेकिन रियाद को लगता है कि बदले में काहिरा का योगदान अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहा।

‘इस्लामिक NATO’ की क्या है खासियत?

मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट को तीनों देशों की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि अभी इस समझौते के संचालन की विस्तृत प्रक्रिया, किन परिस्थितियों में सामूहिक सैन्य कार्रवाई शुरू होगी और संकट के दौरान सदस्य देश एक-दूसरे को किस स्तर पर सैन्य सहायता देंगे, इसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।

मिस्र को शामिल करने के मुद्दे पर सऊदी और तुर्की की अलग-अलग राय इस नए गठजोड़ के भीतर मौजूद रणनीतिक प्राथमिकताओं को भी सामने लाती है। फिलहाल यह समझौता सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान तक सीमित है, जबकि मिस्र की संभावित एंट्री भविष्य में क्षेत्रीय समीकरणों पर निर्भर करेगी।


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