द देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आगामी ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच परमाणु ऊर्जा सहयोग को नई गति मिलने की संभावना जताई जा रही है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दोनों देशों के बीच लंबे समय से लंबित यूरेनियम आपूर्ति से जुड़े व्यावसायिक समझौते पर महत्वपूर्ण प्रगति हो सकती है। यदि बातचीत सफल रहती है तो यह समझौता भारत की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 6 से 11 जुलाई तक इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड की यात्रा पर रहेंगे। इस दौरान ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज के साथ उनकी द्विपक्षीय वार्ता में ऊर्जा, व्यापार, रक्षा और रणनीतिक सहयोग जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होने की संभावना है।
2014 के समझौते को लागू करने पर जोर
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच वर्ष 2014 में नागरिक परमाणु सहयोग समझौते (Civil Nuclear Cooperation Agreement) पर हस्ताक्षर हुए थे। इस समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया से भारत को यूरेनियम आपूर्ति का रास्ता खुला था, लेकिन व्यावसायिक स्तर पर इसकी पूर्ण क्रियान्वयन प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हो सकी है।
विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव (हिंद-प्रशांत) विश्वेश नेगी ने कहा कि दोनों देशों के बीच पिछले कुछ समय से इस विषय पर सकारात्मक और भविष्य को ध्यान में रखते हुए बातचीत चल रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इन चर्चाओं का जल्द ही व्यावहारिक परिणाम सामने आ सकता है।
भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों के लिए अहम है यूरेनियम
भारत वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य के साथ अपनी ऊर्जा क्षमता में बड़े पैमाने पर वृद्धि की योजना पर काम कर रहा है। तेजी से बढ़ते औद्योगिक विकास, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा सेंटर और आधुनिक बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए बड़ी मात्रा में विश्वसनीय बिजली की आवश्यकता होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बढ़ती मांग को पूरा करने में परमाणु ऊर्जा की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, जिसके लिए पर्याप्त मात्रा में यूरेनियम की उपलब्धता आवश्यक है।
ऑस्ट्रेलिया क्यों है भारत के लिए महत्वपूर्ण साझेदार
ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम भंडारों में से एक है। इसी कारण भारत लंबे समय से ऑस्ट्रेलिया के साथ परमाणु ईंधन सहयोग को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। भारत का लक्ष्य भविष्य में अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमता को 63,000 मेगावाट तक बढ़ाना है। इसके लिए बड़े निवेश के साथ-साथ यूरेनियम की स्थिर और दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित करना भी जरूरी माना जा रहा है।
2047 तक कई गुना बढ़ सकती है यूरेनियम की मांग
वर्तमान में भारत की वार्षिक यूरेनियम आवश्यकता लगभग 1,500 से 2,000 टन के बीच है। अनुमान है कि वर्ष 2047 तक यदि देश 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य हासिल करता है, तो यूरेनियम की वार्षिक मांग बढ़कर करीब 5,400 टन तक पहुंच सकती है।
भारत में उपलब्ध यूरेनियम अयस्क अपेक्षाकृत कम गुणवत्ता का माना जाता है और उसका खनन भी महंगा पड़ता है। यही कारण है कि देश अपनी जरूरत का लगभग 70 से 75 प्रतिशत यूरेनियम कनाडा, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और रूस जैसे देशों से आयात करता है।
दौरे से रणनीतिक साझेदारी को भी मिल सकती है मजबूती
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रधानमंत्री मोदी की ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान यूरेनियम आपूर्ति को लेकर कोई ठोस प्रगति होती है, तो इससे केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा ही मजबूत नहीं होगी, बल्कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग को भी नई मजबूती मिलेगी। हालांकि, फिलहाल दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है और किसी अंतिम समझौते की आधिकारिक घोषणा अभी नहीं की गई है।
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