द देवरिया न्यूज़,टोक्यो : जापान ने विज्ञान और रणनीति के मोर्चे पर एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए समुद्र की 6000 मीटर गहराई से रेयर अर्थ एलीमेंट्स निकालने में सफलता पाई है। इसे अब तक लगभग असंभव माना जाता था। प्रशांत महासागर की तलहटी में स्थित मिनामिटोरिशिमा द्वीप के पास यह मिशन पूरा किया गया, जो टोक्यो से करीब 2000 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित एक छोटा मूंगा द्वीप है।
जापानी वैज्ञानिकों ने समुद्री ड्रिलिंग जहाज की मदद से इतनी गहराई से नमूने निकालकर इतिहास रच दिया है। यह पहली बार है जब इतनी गहराई से रेयर अर्थ खनिजों को सफलतापूर्वक निकाला गया है। जापान सरकार ने इसे आर्थिक सुरक्षा और समुद्री संसाधनों के विकास के लिहाज से “मील का पत्थर” बताया है।
क्यों खास हैं रेयर अर्थ एलीमेंट्स?
रेयर अर्थ एलीमेंट्स आधुनिक तकनीक की रीढ़ माने जाते हैं। इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन टर्बाइन, स्मार्टफोन, सेमीकंडक्टर, रडार सिस्टम, मिसाइल और अन्य रक्षा उपकरणों में होता है। ऐसे में इन खनिजों पर नियंत्रण किसी भी देश की तकनीकी और सैन्य ताकत को सीधे प्रभावित करता है।
जापान के पास बड़ा भंडार
अनुमानों के मुताबिक, जापान के समुद्री क्षेत्र में लगभग 1.6 करोड़ टन से अधिक रेयर अर्थ खनिज मौजूद हो सकते हैं, जिससे वह दुनिया के सबसे बड़े भंडार वाले देशों में शामिल हो सकता है। खासकर डाइस्प्रोसियम और यट्रियम जैसे तत्व यहां इतनी मात्रा में हैं कि वे सैकड़ों वर्षों तक जापान की जरूरतें पूरी कर सकते हैं।
चीन की पकड़ को चुनौती
अब तक रेयर अर्थ बाजार में चीन का दबदबा रहा है। एक समय जापान अपनी जरूरत का करीब 90 फीसदी रेयर अर्थ चीन से आयात करता था। लेकिन 2010 में सेनकाकू द्वीप विवाद के दौरान चीन ने जापान को निर्यात रोक दिया था, जिससे टोक्यो को बड़ा झटका लगा। इसी घटना के बाद जापान ने अपनी रणनीति पूरी तरह बदल दी।
रणनीति में बड़ा बदलाव
जापान ने कई मोर्चों पर काम किया—
रेयर अर्थ के उपयोग को कम करने वाली तकनीक विकसित करना
वैकल्पिक सामग्री तैयार करना
रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देना
ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में खनन परियोजनाओं में निवेश
रणनीतिक भंडार बनाना
इन प्रयासों का असर यह हुआ कि चीन पर जापान की निर्भरता घटकर करीब 50 फीसदी रह गई है।
फिर बढ़ा चीन-जापान तनाव
हाल के महीनों में ताइवान को लेकर जापान के रुख के कारण चीन के साथ तनाव फिर बढ़ गया है। इसके जवाब में चीन ने रेयर अर्थ मैग्नेट और अन्य महत्वपूर्ण सामग्रियों के निर्यात को धीमा कर दिया है। इसका असर जापान के ऑटोमोबाइल, सेमीकंडक्टर और रक्षा उद्योग पर पड़ने लगा है।
चुनौती अभी बाकी है
हालांकि यह खोज बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका व्यावसायिक उपयोग आसान नहीं है। 6000 मीटर की गहराई पर खनन करना तकनीकी रूप से जटिल और बेहद महंगा है। पर्यावरणीय जोखिम भी एक बड़ा सवाल है।
इसी को देखते हुए जापान ने अमेरिका के साथ मिलकर “टोक्यो फ्रेमवर्क” नामक समझौता किया है, जिसके तहत इन संसाधनों के दोहन और आपूर्ति को सुरक्षित बनाने की योजना है।
आगे क्या?
अगर जापान इस गहरे समुद्री खनन को आर्थिक और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ बना पाता है, तो यह वैश्विक रेयर अर्थ बाजार में बड़ा बदलाव ला सकता है। इससे न केवल जापान की आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, बल्कि चीन के एकाधिकार को भी बड़ी चुनौती मिलेगी।
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