द देवरिया न्यूज़,इस्लामाबाद : पाकिस्तान में बढ़ती भुखमरी और कुपोषण को लेकर संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट ने चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, जहां दुनिया के कई गरीब और विकासशील क्षेत्रों में पिछले दो दशकों के दौरान भुखमरी की स्थिति में सुधार हुआ है, वहीं पाकिस्तान में हालात इसके उलट दिखाई दे रहे हैं। रिपोर्ट के आंकड़ों के हवाले से कहा जा रहा है कि पिछले करीब दो दशकों में पाकिस्तान में कुपोषित लोगों की संख्या में 37 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
पाकिस्तान की स्थिति ऐसे समय में सामने आई है, जब वैश्विक स्तर पर भुखमरी की दर में लगातार कमी दर्ज की जा रही है। विशेषज्ञों का एक वर्ग पाकिस्तान की इस स्थिति के लिए देश की आर्थिक नीतियों और सेना पर होने वाले भारी खर्च को जिम्मेदार मानता है। उनका तर्क है कि यदि देश के सीमित संसाधनों का बड़ा हिस्सा रक्षा और सैन्य जरूरतों पर खर्च होता है तो शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक कल्याण जैसे क्षेत्रों के लिए संसाधन कम पड़ सकते हैं।
दुनिया में कम हो रही भुखमरी
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में लगातार तीसरे साल वैश्विक भुखमरी में कमी दर्ज की गई। अनुमान के मुताबिक, 2025 में करीब 64.5 करोड़ लोग, यानी दुनिया की लगभग 7.8 प्रतिशत आबादी, भुखमरी की स्थिति का सामना कर रही थी। यह आंकड़ा वर्ष 2024 में 8.1 प्रतिशत और 2022 में 8.6 प्रतिशत था।
हालांकि, दुनिया के सभी हिस्सों में सुधार एक समान नहीं हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, पहली बार अफ्रीका भुखमरी से प्रभावित सबसे ज्यादा लोगों वाला महाद्वीप बन गया है। वर्ष 2025 में अफ्रीका में करीब 30.9 करोड़ लोग भुखमरी से जूझ रहे थे, जबकि एशिया में यह संख्या करीब 29.2 करोड़ थी।
इस तरह वैश्विक भुखमरी का केंद्र धीरे-धीरे एशिया से अफ्रीका की ओर स्थानांतरित हुआ है। एशिया में भुखमरी की स्थिति में सुधार के पीछे भारत और चीन जैसे देशों की प्रगति को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत में कुपोषण के आंकड़ों में बड़ी गिरावट
रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में पिछले दो दशकों में कुपोषण के मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है। वर्ष 2004-06 के दौरान भारत में करीब 24.39 करोड़ लोग कुपोषण का सामना कर रहे थे। वर्ष 2023-25 के दौरान यह संख्या घटकर करीब 14.25 करोड़ रह गई। यानी इस अवधि में करीब 41.6 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
भारत में इस सुधार के पीछे सरकारी कल्याणकारी योजनाओं, खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों, कृषि उत्पादकता में वृद्धि और गरीब तबके तक खाद्यान्न पहुंचाने वाली योजनाओं को अहम कारण माना जाता है। भारत दुनिया की लगभग एक-पांचवीं आबादी का घर है। ऐसे में यहां भुखमरी और कुपोषण के आंकड़ों में सुधार को वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
पाकिस्तान की स्थिति क्यों अलग?
भारत और चीन जैसे पड़ोसी देशों में भुखमरी और कुपोषण के खिलाफ प्रगति के बावजूद पाकिस्तान में स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। विशेषज्ञों के मुताबिक, पाकिस्तान में खाद्य असुरक्षा और कुपोषण के पीछे आर्थिक संकट, महंगाई, बेरोजगारी और कमजोर सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था जैसे कई कारण हैं।
पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक और लेखक हुसैन हक्कानी के हवाले से कहा गया है कि सेना का ध्यान बाहरी भू-राजनीतिक गठबंधनों और रणनीतिक मामलों पर अधिक रहने की वजह से देश के आंतरिक विकास, सुशासन और आम जनता के कल्याण से संसाधन और ध्यान हट गया है।
हालांकि, पाकिस्तान में भुखमरी के लिए केवल रक्षा खर्च को जिम्मेदार ठहराना एक जटिल विषय है। देश की आर्थिक समस्याओं में राजनीतिक अस्थिरता, कमजोर संस्थागत व्यवस्था, कम कर संग्रह, महंगाई, जलवायु संबंधी संकट और खाद्य वितरण की चुनौतियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
रक्षा बजट पर भी उठ रहे सवाल
पाकिस्तान में सामाजिक क्षेत्र की स्थिति खराब होने के बीच रक्षा बजट को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, पाकिस्तान ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए करीब 10.8 अरब डॉलर का रक्षा बजट घोषित किया है, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग 18 प्रतिशत अधिक बताया गया है।
आलोचकों का कहना है कि जब देश आर्थिक संकट और खाद्य असुरक्षा से जूझ रहा हो, तब रक्षा खर्च में बढ़ोतरी पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और खाद्य सुरक्षा में अधिक निवेश से आम लोगों की स्थिति में सुधार किया जा सकता है।
भारत के साथ सैन्य प्रतिस्पर्धा पर भी बहस
पाकिस्तान की आर्थिक प्राथमिकताओं को लेकर देश के भीतर और बाहर लंबे समय से बहस होती रही है। आलोचकों का कहना है कि भारत के साथ लंबे समय से चली आ रही सैन्य प्रतिस्पर्धा और कश्मीर मुद्दे पर लगातार खर्च ने पाकिस्तान के आर्थिक संसाधनों पर दबाव बढ़ाया है।
वहीं, पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था का तर्क रहा है कि क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों और भारत के साथ तनाव के कारण मजबूत रक्षा व्यवस्था जरूरी है। ऐसे में रक्षा खर्च और सामाजिक विकास के बीच संतुलन पाकिस्तान के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
क्या पाकिस्तान अपनी प्राथमिकताएं बदलेगा?
पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह आर्थिक संकट से बाहर निकलने के साथ-साथ अपने नागरिकों के लिए खाद्य और सामाजिक सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करे। वैश्विक स्तर पर भुखमरी में कमी के बावजूद यदि पाकिस्तान में कुपोषण बढ़ता है, तो यह देश की नीतियों और विकास मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान को दीर्घकालिक समाधान के लिए कृषि सुधार, खाद्य वितरण व्यवस्था, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा पर अधिक ध्यान देना होगा। साथ ही रक्षा और विकास खर्च के बीच संतुलन बनाना भी जरूरी होगा।
कुल मिलाकर, संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े पाकिस्तान के लिए एक गंभीर चेतावनी की तरह हैं। जब भारत और चीन जैसे देश बड़ी आबादी को भुखमरी से बाहर निकालने में प्रगति कर रहे हैं, तब पाकिस्तान में कुपोषण के बढ़ते आंकड़े यह सवाल खड़ा करते हैं कि देश के सीमित आर्थिक संसाधनों का इस्तेमाल किस दिशा में किया जा रहा है और क्या उसकी मौजूदा प्राथमिकताएं आम जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में सक्षम हैं।
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