पुराने चावल और सस्ते मैदा से तैयार हो रहे चिप्स
सूत्रों के मुताबिक, गोरखपुर के लाल डिग्गी समेत कई इलाकों में घरों और छोटे कारखानों में इन चिप्स का निर्माण किया जाता है। इन्हें बनाने में अक्सर पुराने और खराब चावल के आटे तथा सस्ते मैदा का इस्तेमाल किया जाता है। खराब गुणवत्ता छिपाने के लिए टार्ट्राजीन, सनसेट येलो, पोंसा फोर आर और कारमोजीन जैसे सिंथेटिक रंग मिलाए जाते हैं, जिससे चिप्स चमकीले और आकर्षक दिखें। जबकि इन रंगों का इस्तेमाल कई खाद्य पदार्थों में प्रतिबंधित या सीमित मात्रा में ही अनुमति प्राप्त है।
बिना मानक जांच के बाजार में पहुंच रहा माल
खाद्य सुरक्षा विभाग के अनुसार, पैक्ड खाद्य पदार्थों पर एफएसएसएआई पंजीकरण नंबर, निर्माण तिथि, समाप्ति तिथि, सामग्री का विवरण और निर्माता की जानकारी होना अनिवार्य है। लेकिन बाजार में बिक रहे इन रंगीन चिप्स के पैकेटों पर ऐसी कोई जानकारी नहीं होती। अधिकतर चिप्स खुले बोरे में बेचे जा रहे हैं। पकड़े जाने पर कारोबारी इसे कुटीर उद्योग का उत्पाद बताकर बच निकलते हैं।
होली और रमजान में तीन से चार गुना बढ़ जाती है मांग
व्यापारियों का कहना है कि होली और रमजान के दौरान चिप्स और पापड़ की मांग सामान्य दिनों के मुकाबले तीन से चार गुना बढ़ जाती है। ज्यादातर माल गोरखपुर की थोक मंडी से देवरिया लाया जाता है, जहां से छोटे दुकानदार इसे मोहल्लों और ग्रामीण बाजारों में बेचते हैं।
सेहत पर पड़ सकता है गंभीर असर
मेडिकल कॉलेज के फिजिशियन डॉ. निखिलेश के अनुसार, खुले और सस्ते रंगीन खाद्य पदार्थों में सिंथेटिक रंग और केमिकल की अधिक मात्रा होने से पेट दर्द, उल्टी, एलर्जी और त्वचा संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए ऐसे उत्पाद अधिक खतरनाक हैं।
विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि त्योहारों के दौरान केवल मानक और पैक्ड खाद्य पदार्थों का ही सेवन करें तथा खुले में बिकने वाले रंगीन चिप्स और अन्य खाद्य पदार्थों से बचें।