हालांकि सरकार और विदेश नीति विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत औपचारिक मध्यस्थता नहीं, बल्कि संवाद और कूटनीति को बढ़ावा देना है। भारत ने पूरे संकट के दौरान लगातार यही रुख अपनाया और सभी संबंधित पक्षों से संपर्क बनाए रखा।
सूत्रों के अनुसार, संसदीय समिति की बैठक में कई सांसदों ने सरकार से पूछा कि भारत ने पश्चिम एशिया संकट के दौरान किस प्रकार का कूटनीतिक हस्तक्षेप किया और क्या नई दिल्ली ने तनाव कम कराने के लिए पर्दे के पीछे कोई भूमिका निभाई। इस दौरान कुछ सदस्यों ने यह भी सवाल उठाया कि पाकिस्तान अपनी भूमिका का सार्वजनिक रूप से प्रचार कर रहा है, जबकि भारत अपेक्षाकृत शांत क्यों रहा।
सरकारी सूत्रों ने बताया कि भारत ने संघर्ष के शुरुआती चरण से ही संयम बरतने, तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान निकालने की वकालत की थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर दोनों ने ईरान समेत क्षेत्र के कई प्रमुख नेताओं से बातचीत की। प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से बातचीत में क्षेत्रीय तनाव कम करने और शांति बहाल करने की आवश्यकता पर जोर दिया था। इसके अलावा भारतीय विदेश मंत्री और ईरानी विदेश मंत्री के बीच भी कई दौर की टेलीफोन वार्ता हुई।
विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जानबूझकर “औपचारिक मध्यस्थ” की भूमिका से दूरी बनाए रखता है। भारत की पारंपरिक विदेश नीति यह रही है कि वह संवाद को प्रोत्साहित करता है, लेकिन खुद को सार्वजनिक रूप से मध्यस्थ घोषित नहीं करता। यही नीति रूस-यूक्रेन युद्ध, इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष और अन्य अंतरराष्ट्रीय संकटों में भी अपनाई गई है।
पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राव ने सोशल मीडिया पर इस विषय पर टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत को शांति और तनाव कम करने की दिशा में सक्रिय रहना चाहिए, लेकिन उसे किसी एक पक्ष के नैरेटिव का हिस्सा बनने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत की विश्वसनीयता उसकी संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति में निहित है।
विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान द्वारा अपनी कथित मध्यस्थता का प्रचार घरेलू राजनीतिक और कूटनीतिक लाभ लेने की रणनीति हो सकती है, जबकि भारत आमतौर पर अपने कूटनीतिक प्रयासों को प्रचारित करने से बचता है।
भारत के लिए पश्चिम एशिया रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है, क्योंकि यहां भारत के ऊर्जा हित, प्रवासी भारतीयों की बड़ी आबादी और व्यापारिक संबंध जुड़े हुए हैं। ऐसे में नई दिल्ली का प्राथमिक उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है। फिलहाल भारत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह आगे भी पश्चिम एशिया में शांति, स्थिरता और संवाद आधारित समाधान का समर्थन करता रहेगा, भले ही वह औपचारिक मध्यस्थ की भूमिका से दूर रहे।