रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस यह कदम ऐसे समय उठा रहा है जब यूरो ज़ोन के देशों में उसका बजट घाटा पहले से ही काफी अधिक है। इसके बावजूद राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार का मानना है कि बदलते वैश्विक सुरक्षा माहौल में सैन्य शक्ति बढ़ाना राष्ट्रीय आवश्यकता बन चुका है।
सरकार द्वारा पेश किए गए संशोधित 2024-2030 रक्षा योजना कानून के तहत फ्रांस का रक्षा खर्च वर्तमान में GDP के लगभग 2 प्रतिशत से बढ़ाकर 2030 तक 2.5 प्रतिशत किया जाएगा। इससे देश का वार्षिक रक्षा बजट बढ़कर 76.3 अरब यूरो तक पहुंच जाएगा, जो 2017 के मुकाबले लगभग दोगुना होगा।
फ्रांस की रक्षा मंत्री कैथरीन वॉट्रिन ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति में आए गहरे और कठोर बदलावों ने फ्रांस को अधिक मजबूती और तेजी से आगे बढ़ने के लिए विवश किया है। उन्होंने कहा कि दुनिया अब स्थायी और बहुआयामी संघर्षों के दौर में प्रवेश कर चुकी है, जिसके लिए सैन्य तैयारी बढ़ाना आवश्यक है।
इस रक्षा विस्तार का सबसे अहम हिस्सा फ्रांस की परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करना है। राष्ट्रपति मैक्रों पहले ही मार्च 2026 में परमाणु शस्त्रागार बढ़ाने और यूरोपीय सहयोगियों को फ्रांस की परमाणु सुरक्षा छतरी उपलब्ध कराने का ऐलान कर चुके हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, फ्रांस अपने वर्तमान लगभग 300 परमाणु हथियारों की संख्या बढ़ाने की योजना बना रहा है।
रक्षा बजट का करीब 13 प्रतिशत हिस्सा परमाणु हथियार कार्यक्रमों पर खर्च किया जाएगा। फ्रांस पहले से ही दुनिया का चौथा सबसे बड़ा परमाणु हथियार संपन्न देश है और हर साल अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम पर लगभग 5.6 अरब यूरो खर्च करता है।
फ्रांस ने मिसाइल और वायु रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए भी बड़ा निवेश प्रस्तावित किया है। सरकार ने तोपखाने के गोले, एयर डिफेंस इंटरसेप्टर और लंबी दूरी की मिसाइलों के स्टॉक बढ़ाने के लिए 8.5 अरब यूरो अतिरिक्त आवंटित किए हैं।
इसके अलावा, फ्रांस 2,500 किलोमीटर तक मार करने वाली नई पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइल विकसित करने पर भी काम करेगा, जिससे उसकी ‘डीप-स्ट्राइक’ क्षमता और मजबूत होगी।
विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया संकट और नाटो को लेकर अमेरिका की अनिश्चित नीति ने यूरोपीय देशों को अपनी सैन्य आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए मजबूर किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नाटो से दूरी बनाने के संकेतों ने यूरोप में सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
फ्रांस के इस कदम को यूरोप की सामूहिक रक्षा नीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में महाद्वीप की रणनीतिक दिशा तय कर सकता है।