बताया जा रहा है कि ईरान इस प्रस्ताव के तहत पड़ोसी देश ओमान को भी ट्रांजिट फीस में हिस्सा देने की योजना बना रहा है। हालांकि ओमान ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि होर्मुज स्ट्रेट पर किसी प्रकार का टोल लगाने का कोई औपचारिक समझौता नहीं हुआ है और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग पर शुल्क लगाने का मामला जटिल है।
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। ईरान और ओमान के बीच स्थित यह लगभग 34 किलोमीटर चौड़ा समुद्री रास्ता वैश्विक तेल आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। दुनिया के कुल तेल व्यापार का करीब पांचवां हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की बाधा या अतिरिक्त शुल्क का असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर पड़ सकता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान का कहना है कि संभावित टोल से मिलने वाली राशि का उपयोग युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई और पुनर्निर्माण कार्यों में किया जाएगा। ईरानी प्रशासन का दावा है कि हालिया संघर्ष के कारण उसके रक्षा, प्रशासनिक और नागरिक ढांचे को भारी नुकसान हुआ है।
वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्धविराम को “दुनिया की शांति के लिए बड़ा दिन” बताते हुए कहा कि ईरान अब पुनर्निर्माण की दिशा में बढ़ सकता है। ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री यातायात को सुचारु रखने में सहयोग करेगा और अमेरिकी सैनिक क्षेत्र में मौजूद रहेंगे ताकि सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून (UNCLOS) के तहत किसी अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग पर एकतरफा टोल लगाना कानूनी चुनौती पैदा कर सकता है। ऐसे में ईरान की यह योजना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद का कारण बन सकती है।
इस घटनाक्रम का असर भारत पर भी पड़ सकता है, क्योंकि भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। इसके अलावा ओमान और भारत के बीच गहरे आर्थिक और सामरिक संबंध हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच 10.61 अरब डॉलर का व्यापार हुआ, जबकि ओमान में करीब पांच लाख भारतीय निवास करते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान वास्तव में होर्मुज स्ट्रेट पर टोल लागू करता है, तो इससे वैश्विक व्यापार, तेल कीमतों और क्षेत्रीय राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि आने वाले दिनों में ईरान, ओमान और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाते हैं।