यह मामला भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष आया, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस बी. वी. नागरत्ना भी शामिल थीं।
सीजेआई ने जताई नाराजगी
लाइवलॉ की रिपोर्ट के अनुसार, सीजेआई सूर्यकांत ने कहा,
“हम इस बात से परेशान हैं कि कुछ वकीलों ने एआई से ड्राफ्टिंग शुरू कर दी है। यह बहुत गलत है।”
जस्टिस नागरत्ना ने भी एक हालिया मामले का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्हें ‘मर्सी बनाम मैनकाइंड’ नामक एक फैसले का हवाला दिया गया, जो कभी अस्तित्व में ही नहीं था।
सीजेआई ने यह भी बताया कि जस्टिस दीपांकर दत्ता की अदालत में भी इसी तरह की घटना सामने आई थी, जहां एक नहीं बल्कि कई फर्जी फैसलों का संदर्भ दिया गया।
फर्जी कोटेशन से बढ़ा अतिरिक्त बोझ
जस्टिस नागरत्ना ने एक अन्य मामले का जिक्र किया, जिसमें फैसला तो वास्तविक था, लेकिन उसमें दिए गए उद्धरण (कोटेशन) गलत और मनगढ़ंत थे। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थितियों से न्यायाधीशों पर अनावश्यक अतिरिक्त बोझ पड़ता है, क्योंकि उन्हें हर संदर्भ की सत्यता की जांच करनी पड़ती है।
पिछले सप्ताह भी जस्टिस नागरत्ना ने फर्जी उद्धरणों को लेकर चिंता व्यक्त की थी।
ड्राफ्टिंग की गिरती गुणवत्ता पर सवाल
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि आजकल कानूनी ड्राफ्टिंग की गुणवत्ता में स्पष्ट गिरावट देखी जा रही है। उन्होंने विशेष रूप से स्पेशल लीव पिटीशनों (SLP) का जिक्र किया, जो अक्सर पुराने फैसलों के लंबे-लंबे उद्धरणों से भरी होती हैं, लेकिन उनमें मौलिकता और स्पष्टता की कमी होती है।
जस्टिस बागची ने वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक कुमार सेन का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले के दौर में ड्राफ्टिंग सटीक, संक्षिप्त और प्रभावी हुआ करती थी।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने लगाया जुर्माना
हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी एआई से तैयार एक याचिका में फर्जी उद्धरण के इस्तेमाल पर याचिकाकर्ता पर जुर्माना लगाया था। यह कदम न्यायालयों द्वारा एआई के गैर-जिम्मेदाराना उपयोग पर सख्ती का संकेत माना जा रहा है।
एआई का जिम्मेदार इस्तेमाल जरूरी
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां यह स्पष्ट करती हैं कि तकनीक का इस्तेमाल सहायक उपकरण के रूप में किया जा सकता है, लेकिन बिना सत्यापन के एआई पर पूरी तरह निर्भर रहना न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता को प्रभावित कर सकता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि एआई का उपयोग करते समय तथ्यों और कानूनी संदर्भों की मानव स्तर पर जांच अनिवार्य होनी चाहिए, ताकि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता बनी रहे।