18 जेट सीधे फ्रांस से, 96 भारत में बनेंगे
प्रस्ताव के अनुसार, 114 राफेल विमानों में से 18 विमान फ्रांस से पूरी तरह तैयार हालत में खरीदे जाएंगे। जबकि शेष 96 विमानों का निर्माण भारत में ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत किया जाएगा। भारत इस शर्त पर कोई समझौता नहीं करना चाहता, क्योंकि इसका उद्देश्य देश में रक्षा निर्माण क्षमता को मजबूत करना है। फ्रांसीसी मीडिया के मुताबिक, फ्रांस को अपनी असेंबली लाइन भारत में स्थानांतरित करने में शुरुआती हिचकिचाहट है, लेकिन इतने बड़े सौदे को देखते हुए वह इस पर विचार कर रहा है।
इंडोनेशिया से महंगी क्यों है भारत की डील
इंडोनेशिया ने 2022 में 42 राफेल जेट लगभग 8.1 अरब डॉलर (करीब 68,000 करोड़ रुपये) में खरीदे थे, यानी प्रति विमान करीब 1,747 करोड़ रुपये। वहीं भारत की संभावित डील में प्रति विमान लागत लगभग 2,850 करोड़ रुपये बैठती है। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत का पैकेज अधिक व्यापक और उन्नत तकनीक से लैस है।
भारत की डील में एडवांस्ड मेटियोर और SCALP मिसाइलें, HAMMER प्रिसिजन बम, मिशन सिमुलेटर, स्पेयर पार्ट्स, लंबे समय तक मेंटेनेंस और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर शामिल हैं। भारत पूरे जीवनकाल (लाइफ-साइकिल) के लिए सपोर्ट और अपग्रेड का खर्च भी इसी पैकेज में शामिल कर रहा है।
भारतीय परिस्थितियों के अनुसार विशेष बदलाव
भारतीय राफेल विमानों को लद्दाख की अत्यधिक ठंड और राजस्थान की भीषण गर्मी जैसी अलग-अलग परिस्थितियों में ऑपरेट करने के लिए विशेष रूप से अनुकूल बनाया जाएगा। इससे इन विमानों की परिचालन क्षमता और विश्वसनीयता बढ़ेगी।
F4 और F5 वैरिएंट से मिलेगी नई ताकत
भारत फिलहाल राफेल के F3R वैरिएंट का उपयोग कर रहा है, जिसे धीरे-धीरे F4 वैरिएंट में अपग्रेड किया जाएगा। इसके अलावा भारत भविष्य में F5 वैरिएंट के करीब 24 और अत्याधुनिक विमान खरीदने की भी योजना बना रहा है। F5 वैरिएंट में छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों जैसी कई उन्नत क्षमताएं होंगी।
इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर जोर
इस डील के तहत भारत में असेंबली लाइन, ट्रेनिंग सेंटर और मेंटेनेंस इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जाएगा। इसके अलावा राफेल के M88 इंजन से जुड़ी तकनीक हासिल करने पर भी बातचीत चल रही है। इससे भारत को भविष्य में अपने स्वदेशी लड़ाकू विमान, जैसे AMCA, के निर्माण में मदद मिलेगी।
महंगी लेकिन रणनीतिक रूप से अहम डील
विशेषज्ञों का मानना है कि यह डील भले ही महंगी दिख रही हो, लेकिन इससे भारत को तकनीकी आत्मनिर्भरता, रक्षा उत्पादन क्षमता और दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ मिलेगा। ‘मेक इन इंडिया’ के तहत भारत अब केवल खरीदार नहीं, बल्कि रक्षा उपकरणों का निर्माता बनने की दिशा में बड़ा कदम उठा रहा है।