द देवरिया न्यूज़,तेहरान : ईरान और अमेरिका-इजरायल गठबंधन के बीच जारी संघर्ष के बीच ईरान की मिसाइल क्षमता चर्चा के केंद्र में है। विशेषज्ञों का दावा है कि ईरान की कई बैलिस्टिक मिसाइल तकनीकें उत्तर कोरिया से प्राप्त या उससे प्रेरित हैं। हालिया हमलों में ईरान ने इजरायल, खाड़ी देशों और अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने हिंद महासागर स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे डिएगो गार्सिया की दिशा में भी मिसाइल दागी। विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें उत्तर कोरिया की ‘मुसुदान’ मिसाइल जैसी तकनीक का इस्तेमाल हो सकता है। बताया जाता है कि ईरान ने वर्ष 2005 में इस श्रेणी की मिसाइलें उत्तर कोरिया से खरीदी थीं।
उत्तर कोरिया-ईरान रक्षा सहयोग
विशेषज्ञों के मुताबिक, दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग कई दशकों पुराना है।
टेक्सास की एंजेलो स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ब्रूस बेचटोल के अनुसार:
- उत्तर कोरिया हथियार और तकनीक उपलब्ध कराता रहा है
- ईरान बदले में ऊर्जा (तेल) सहयोग देता है
1990 के दशक में ईरान ने उत्तर कोरिया से नो-डोंग (Nodong) मिसाइलें हासिल कीं, जिनके आधार पर आगे चलकर उसने शाहब-3, इमाद और कादर जैसी मिसाइलें विकसित कीं।
ईरान की मिसाइल क्षमता
रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान के पास:
- लगभग 1,000 किमी रेंज की शॉर्ट रेंज मिसाइलें
- 3,000 किमी तक मार करने वाली मीडियम रेंज मिसाइलें
- लंबी दूरी की मिसाइल तकनीक पर कार्य जारी
ईरान की कुछ मिसाइलें कियाम (Qiam) प्रणाली पर आधारित मानी जाती हैं, जिसे उत्तर कोरियाई सहयोग से विकसित किया गया बताया जाता है।
हमलों में किसका इस्तेमाल?
विशेषज्ञों का कहना है कि:
- शाहब-3 मिसाइल, नो-डोंग से मिलती-जुलती है
- इनका इस्तेमाल इजरायल और खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर हमलों में किया गया
- बैलिस्टिक मिसाइलों ने क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ा दिया है
युद्ध की अब तक की स्थिति
- 28 फरवरी से ईरान बनाम अमेरिका-इजरायल के बीच संघर्ष जारी
- शुरुआत अमेरिका-इजरायल के हवाई हमलों के बाद हुई
- ईरान में अब तक 3,000 से अधिक मौतों की खबर
- जवाबी कार्रवाई में ईरान ने कई मिसाइल हमले किए
- इजरायल के शहरों और अमेरिकी ठिकानों को नुकसान
- मध्यस्थता की कोशिशें अब तक असफल
ईरान की बढ़ती मिसाइल क्षमता और उत्तर कोरिया के साथ उसके कथित तकनीकी सहयोग ने मध्य पूर्व में संघर्ष को और जटिल और खतरनाक बना दिया है। आने वाले समय में यह साझेदारी क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
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