ईरान ने इस मामले पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए खाड़ी के देशों—विशेष रूप से सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE)—से स्पष्टीकरण मांगा है। ईरान का कहना है कि इन देशों के पास इस तरह के ड्रोन मौजूद हैं, ऐसे में यह स्पष्ट किया जाए कि यह ड्रोन किसका था और किस उद्देश्य से ईरानी हवाई क्षेत्र में प्रवेश किया।
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाकाई ने सोशल मीडिया पर ड्रोन के मलबे की तस्वीरें साझा करते हुए कहा कि यह घटना “कुछ क्षेत्रीय देशों की अमेरिका और इजरायल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ आक्रामक गतिविधियों में संलिप्तता” का संकेत हो सकती है। हालांकि, सऊदी अरब और UAE की ओर से इस पर अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
बताया जा रहा है कि शुरुआती रिपोर्ट्स में इस ड्रोन को अमेरिकी MQ-9 रीपर समझा गया था, लेकिन बाद में जांच में यह चीनी विंग लूंग II निकला। दोनों ड्रोन का डिजाइन और आकार काफी हद तक एक जैसा है, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो गई थी।
विंग लूंग II ड्रोन को चीन की चेंगदू एयरक्राफ्ट कॉर्पोरेशन ने विकसित किया है और यह चीन के सबसे सफल सैन्य ड्रोन में गिना जाता है। यह ड्रोन करीब 480 किलोग्राम तक हथियार ले जाने में सक्षम है, जिसमें मिसाइल, गाइडेड बम और रॉकेट शामिल हैं। इसकी रेंज लगभग 1500 किलोमीटर तक बताई जाती है।
चीन इस ड्रोन को अमेरिकी MQ-9 रीपर का सस्ता विकल्प बताकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेश करता है। जहां विंग लूंग II की कीमत 40 से 60 लाख डॉलर के बीच है, वहीं अमेरिकी रीपर ड्रोन की कीमत 3 करोड़ डॉलर या उससे अधिक होती है। यही कारण है कि कई देश, खासकर वे जो अमेरिकी हथियारों पर लगी शर्तों से बचना चाहते हैं, चीनी ड्रोन को प्राथमिकता देते हैं।
इस घटना ने चीन की चिंता भी बढ़ा दी है, क्योंकि ऐसे घटनाक्रम उसके ड्रोन की वैश्विक छवि और बाजार पर असर डाल सकते हैं। वहीं, पश्चिम एशिया में पहले से जारी तनाव के बीच इस घटना ने क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा समीकरण को और जटिल बना दिया है।