द देवरिया न्यूज़,देवरिया। विश्व भोजपुरी सम्मेलन के दो दिवसीय प्रांतीय अधिवेशन के दूसरे दिन रविवार को बतकही सत्र एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में भोजपुरी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की जोरदार मांग उठी। इस दौरान भोजपुरी क्षेत्र के विद्वानों और साहित्यकारों को सम्मानित भी किया गया।
देर शाम आयोजित कवि सम्मेलन और मुशायरे में कवियों व शायरों ने एक से बढ़कर एक कविता और शायरी प्रस्तुत की, जिसे सुनकर भोजपुरी प्रेमी मंत्रमुग्ध हो गए। पूरे पंडाल में तालियों की गड़गड़ाहट गूंजती रही।
कार्यक्रम की शुरुआत बतकही सत्र से हुई। मुख्य अतिथि विश्व भोजपुरी सम्मेलन के राष्ट्रीय सचिव डॉ. देवेंद्र नाथ तिवारी ने कहा कि अब तक भोजपुरी को संवैधानिक दर्जा नहीं मिल सका है, जबकि इसे लगातार आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग की जा रही है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक मान्यता मिलने के बाद ही भोजपुरी भाषा का समुचित विकास संभव है। साथ ही उन्होंने उत्तर प्रदेश में भोजपुरी अकादमी की स्थापना पर भी जोर दिया।
प्रो. वाचस्पति द्विवेदी ने कहा कि लगभग 30 करोड़ लोगों की भाषा होने के बावजूद भोजपुरी की अपनी लिपि नहीं है, जो इसके संवैधानिक दर्जे में सबसे बड़ी बाधा है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मैथिली भाषा को अपनी लिपि होने के कारण संवैधानिक मान्यता मिल सकी।
बताकही सत्र में राष्ट्रीय मंत्री अजय ओझा, राजकुमार बावरा सहित अन्य विद्वानों ने विचार रखे। इस अवसर पर भोजपुरी के विद्वानों और साहित्यकारों को सम्मानित किया गया। डॉ. मोहन पांडेय ‘भ्रमर’ को ध्रुवदेव मिश्र पाषाण पुरस्कार और डॉ. देवेंद्र तिवारी को अरुणेश नीरन सम्मान से नवाजा गया। सत्र का संचालन प्रो. शैलेन्द्र राव ने किया।
कार्यक्रम में विश्व भोजपुरी सम्मेलन के संस्थापक सदस्य जगदीश उपाध्याय, राष्ट्रीय अध्यक्ष अजीत दूबे, प्रांतीय अध्यक्ष सिद्धार्थ मणि, जिलाध्यक्ष गिरिजेश मिश्र, झारखंड से डॉ. अजय ओझा, वाराणसी से अपूर्व नारायण तिवारी सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।
अधिवेशन में सर्वसम्मति से पारित हुए तीन प्रस्ताव
अधिवेशन में सर्वसम्मति से तीन प्रस्ताव पारित किए गए। पहले प्रस्ताव में भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में अनिवार्य रूप से शामिल किए जाने की मांग की गई। इसमें कहा गया कि भोजपुरी का व्याकरण, साहित्य, संस्कृति और बाजार कई मान्यता प्राप्त भाषाओं से अधिक व्यापक है।
दूसरे प्रस्ताव में उत्तर प्रदेश में भोजपुरी अकादमी की स्थापना को अनिवार्य बताया गया। इसमें उल्लेख किया गया कि बिहार, मध्यप्रदेश और दिल्ली में पहले से भोजपुरी अकादमी कार्यरत हैं और उत्तर प्रदेश में इसकी स्थापना से भाषा के विकास को नई दिशा मिलेगी।
तीसरे प्रस्ताव में भोजपुरी भाषा और संस्कृति की मधुरता एवं व्यापकता को ध्यान में रखते हुए इसके व्यावसायिक प्रयोग के लिए एक सशक्त नियामक आयोग या सेंसर बोर्ड के गठन की मांग की गई, ताकि अश्लीलता पर नियंत्रण रखा जा सके और भोजपुरी भाषा व संस्कृति को संरक्षण मिल सके।
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