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दुनिया बहुध्रुवीय दौर में प्रवेश कर चुकी है: विदेश मंत्री एस. जयशंकर

Published on: December 21, 2025
The world enters a multipolar era

द देवरिया न्यूज़,पुणे। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कहा है कि वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था इस समय एक बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। अब दुनिया किसी एक शक्ति के इर्द-गिर्द नहीं घूमती, बल्कि ताकत और प्रभाव के कई केंद्र उभर चुके हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आज के समय में कोई भी देश, चाहे वह कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, सभी मुद्दों पर अपनी इच्छा दूसरों पर थोपने की स्थिति में नहीं है।

पुणे में सिम्बायोसिस इंटरनेशनल (डीम्ड यूनिवर्सिटी) के 22वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में देशों के बीच एक स्वाभाविक प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है, जो अपने आप में एक नया संतुलन भी तैयार कर रही है। उन्होंने कहा कि अब शक्ति सिर्फ सैन्य ताकत तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यापार, ऊर्जा, संसाधन, तकनीक, टैलेंट और नवाचार जैसे कई आयामों में बंटी हुई है, जिससे वैश्विक परिदृश्य पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो गया है।

वैश्विक शक्तियां अब सर्वशक्तिमान नहीं

डॉ. जयशंकर ने कहा कि यह समझना जरूरी है कि वैश्विक शक्तियां अब सार्वभौमिक नहीं रहीं। वैश्वीकरण ने देशों के सोचने और काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। उन्होंने कहा कि बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के लिए अब यह अनिवार्य हो गया है कि वे तकनीक के साथ कदम से कदम मिलाकर चलें और आधुनिक व महत्वपूर्ण मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को विकसित करें। इससे ही आर्थिक मजबूती और रणनीतिक आत्मनिर्भरता हासिल की जा सकती है।

नई पीढ़ी पर विकसित भारत की जिम्मेदारी

विदेश मंत्री ने अपने छात्र जीवन को याद करते हुए कहा कि उस समय दुनिया अपेक्षाकृत सरल और कम जटिल थी, लेकिन आज वैश्विक हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। न सिर्फ दुनिया बदली है, बल्कि समाज और देश के भीतर भी बड़े परिवर्तन हुए हैं। उन्होंने कहा कि अब नई पीढ़ी पर यह जिम्मेदारी है कि वह ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को आगे बढ़ाए और देश को वैश्विक नेतृत्व की दिशा में ले जाए।

इतिहास से लेकर वर्तमान तक भारत की रणनीति

बांग्लादेश के गठन के बाद के दौर का जिक्र करते हुए जयशंकर ने कहा कि उस समय भारत को पाकिस्तान के साथ-साथ पश्चिमी देशों और चीन जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता था। ऐसे में भारत ने सोवियत संघ के साथ एक मजबूत रणनीतिक साझेदारी बनाई। यह वह दौर था जब देश में आर्थिक सुधार नहीं हुए थे, विकास दर कम थी, लाइसेंस-परमिट राज हावी था और विदेशी व्यापार सीमित था। आज की तुलना में उस समय भारत और दुनिया के रिश्ते बिल्कुल अलग थे।

पश्चिमी देशों का ठहराव और वैश्विक बदलाव

डॉ. जयशंकर ने कहा कि आजादी के बाद कई देशों ने सही नीतियों और निर्णयों के जरिए समृद्धि हासिल की और अब वे अपनी किस्मत खुद तय करने की स्थिति में हैं। इस प्रक्रिया में चीन ने सबसे अधिक लाभ उठाया, लेकिन भारत ने भी आर्थिक सुधारों के बाद और खासतौर पर पिछले एक दशक में उल्लेखनीय प्रगति की है। इसके उलट, पश्चिमी दुनिया के बड़े हिस्से में अब ठहराव की भावना देखी जा रही है, जो धीरे-धीरे राजनीतिक असंतोष में बदल रही है।

उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों ने अधिक मुनाफे के लिए उत्पादन इकाइयों को दूसरे देशों में शिफ्ट किया, जिससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर हुई। इन सभी घटनाओं का संयुक्त परिणाम यह हुआ कि वैश्विक आर्थिक और उसके बाद राजनीतिक रैंकिंग में बड़ा बदलाव आया है। यही बदलाव आज की बहुध्रुवीय दुनिया की असली पहचान है।


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