द देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली : असहनीय पीड़ा और लाइलाज बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए इच्छामृत्यु (यूथनेशिया) एक संवेदनशील लेकिन अहम मुद्दा रहा है। ऐसे ही एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा संकेत दिया है। 31 वर्षीय हरीश राणा, जो पिछले 13 वर्षों से कोमा में हैं, उनके ‘निष्क्रिय इच्छामृत्यु’ (Passive Euthanasia) से जुड़े मामले में अदालत ने कहा है कि अब इस याचिका पर निर्णय लेने का समय आ गया है। हालांकि, अंतिम फैसला लेने से पहले सुप्रीम कोर्ट ने हरीश के माता-पिता से सीधे बातचीत करने का फैसला किया है।
हरीश राणा वर्ष 2011 से कोमा में हैं और उनकी हालत में अब तक कोई सुधार नहीं हो सका है। इस मामले में एम्स (AIIMS) मेडिकल बोर्ड की दूसरी रिपोर्ट भी अदालत के सामने पेश की गई है, जो पहली रिपोर्ट के समान ही है। रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि हरीश के ठीक होने की संभावना लगभग न के बराबर है। इसी आधार पर उनके परिजनों ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी है।
भारत में इच्छामृत्यु पर बहस की शुरुआत
भारत में इच्छामृत्यु को लेकर बहस 2000 के दशक की शुरुआत में तेज हुई थी। वर्ष 2005 में विधि आयोग की 196वीं रिपोर्ट ‘असाध्य रूप से बीमार रोगियों का चिकित्सा उपचार’ सामने आई, जिसने इस विषय को कानूनी और सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना दिया। इस रिपोर्ट में गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार पर गंभीरता से विचार किया गया।
अरुणा शानबाग मामला बना मील का पत्थर
इच्छामृत्यु से जुड़ा सबसे चर्चित मामला मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग का रहा। 1973 में हुए एक भयावह हमले के बाद वह 37 वर्षों से अधिक समय तक कोमा में रहीं। वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कुछ शर्तों के साथ निष्क्रिय इच्छामृत्यु को अनुमति दी। यह भारत में पहली बार था जब कोर्ट ने स्वीकार किया कि कुछ विशेष परिस्थितियों में लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाया जा सकता है, बशर्ते यह प्रक्रिया अदालत और मेडिकल बोर्ड की सख्त निगरानी में हो।
विधि आयोग की 241वीं रिपोर्ट
अरुणा शानबाग केस के बाद, विधि आयोग ने 2012 में अपनी 241वीं रिपोर्ट जारी की। इसमें निष्क्रिय इच्छामृत्यु को लेकर पहले की सिफारिशों को दोहराया गया और मरीजों, उनके परिजनों तथा डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए स्पष्ट कानूनी दिशानिर्देश तय करने की जरूरत बताई गई।
2018 में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय
मार्च 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘कॉमन कॉज बनाम भारत संघ’ मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध करार दिया। साथ ही, अदालत ने ‘लिविंग विल’ को भी कानूनी मान्यता दी, जिसके तहत कोई व्यक्ति पहले से यह इच्छा जता सकता है कि गंभीर और लाइलाज बीमारी की स्थिति में उसे किस तरह का इलाज दिया जाए या नहीं दिया जाए।
अब हरीश राणा का मामला एक बार फिर इच्छामृत्यु पर राष्ट्रीय बहस को केंद्र में ले आया है। सुप्रीम कोर्ट का आने वाला फैसला न केवल इस परिवार के लिए, बल्कि भविष्य में ऐसे सभी मामलों के लिए एक अहम मिसाल साबित हो सकता है।
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