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7 अक्टूबर हमले में कैसे फेल हुई मोसाद, और अब क्या बदला?

Published on: December 8, 2025
How in October 7 attack

द देवरिया न्यूज़ : 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इजरायल पर किए गए बड़े हमले के बाद दुनिया भर में एक ही सवाल उठा—इतनी ताकतवर मानी जाने वाली इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद इस हमले की भनक क्यों नहीं लग सकी? इजरायल में NBT से बातचीत के दौरान खुफिया और सैन्य अधिकारियों ने खुलकर स्वीकार किया कि यह एक बड़ा इंटेलिजेंस फेलियर था और वे हमास के इरादों को सही तरह से पढ़ने में नाकाम रहे।

अधिकारियों का कहना था कि उनके पास जानकारी और डेटा मौजूद थे, लेकिन वे “रियल पिक्चर” नहीं देख पाए। हमास की गतिविधियों को उन्होंने सिर्फ प्रशिक्षण और दिखावे के रूप में लिया, जबकि असल में यह एक बड़े हमले की तैयारी थी।


मोसाद कहां चूक गई?

इजरायली रक्षा बलों (IDF) से जुड़े पूर्व इंटेलिजेंस अधिकारियों के मुताबिक, समस्या यह थी कि वे यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि हमास इतना बड़ा हमला करने में सक्षम है।
उनके मुताबिक:

  • हमास की ट्रेनिंग साफ दिख रही थी

  • धमकी भरे बयान भी लगातार मिल रहे थे

  • लेकिन सब कुछ “बकवास” या “शो-ऑफ” मान लिया गया

यानी डेटा मौजूद था, लेकिन मानसिक पूर्वाग्रह (cognitive bias) के चलते सही निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका।


एक साल बाद बदली तस्वीर: पेजर ब्लास्ट ऑपरेशन

17 सितंबर 2024 को लेबनान में हुए पेजर विस्फोट हमले के बाद एक बार फिर मोसाद की सटीक प्लानिंग की चर्चा हुई। इस हमले में हिजबुल्लाह के दर्जनों सदस्य मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। बताया गया कि इस ऑपरेशन की तैयारी करीब 10 सालों से चल रही थी, हालांकि इजरायल ने आधिकारिक रूप से इसकी जिम्मेदारी नहीं ली।

इससे साफ हुआ कि मोसाद की क्षमता खत्म नहीं हुई थी, बल्कि हमास के मामले में मानसिक चूक सबसे बड़ी वजह बनी।


अब क्या बदला? एआई पर भरोसा

7 अक्टूबर की गलती से सबक लेते हुए अब इजरायली खुफिया तंत्र बड़े बदलाव की दिशा में काम कर रहा है। IDF के पूर्व इंटेलिजेंस अधिकारियों ने एआई आधारित सिस्टम विकसित करना शुरू किया है।

गोन एवनोन और उनके साथियों ने मिलकर “रेड वैली” नाम की टेक कंपनी शुरू की है। गोन एवनोन ने बताया कि:

  • अब तक इंसानों को ही ट्रेन किया जाता था

  • लेकिन इंसानों में पूर्वाग्रह हो सकते हैं

  • एआई इन कॉग्निटिव बायस को कम करने में मदद करेगा

उनका कहना है कि अब लक्ष्य यह है कि भविष्य में कोई भी खतरा सिर्फ “सोच के दायरे” में अटक न जाए, जैसा 7 अक्टूबर को हुआ था।


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