द देवरिया न्यूज़ : यामी गौतम और इमरान हाशमी स्टारर फिल्म ‘हक’ रिलीज से पहले ही विवादों में फंस गई है। यह फिल्म प्रसिद्ध शाहबानो केस पर आधारित बताई जा रही है, जिसने 1970 के दशक में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर देशभर में बड़ी बहस छेड़ दी थी। अब शाहबानो की बेटी सिद्दिका बेगम खान ने फिल्म की रिलीज रोकने की मांग करते हुए इंदौर हाई कोर्ट में याचिका दायर की है और साथ ही फिल्म के निर्माताओं को लीगल नोटिस भी भेजा है। फिल्म के मेकर्स के खिलाफ दायर इस याचिका पर अदालत में जल्द सुनवाई की जाएगी।
‘मुस्लिम समुदाय की भावनाएं आहत होंगी’ – वकील तौसिफ वारसी
सिद्दिका बेगम खान की ओर से उनके वकील तौसिफ वारसी ने कोर्ट में दलील दी कि फिल्म ‘हक’ में मुस्लिम समाज और शरिया कानून की छवि को नकारात्मक रूप में दिखाया गया है। वकील ने कहा कि यह फिल्म मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा सकती है और इससे सामाजिक असंतोष भी पैदा हो सकता है।
इसके अलावा, याचिका में यह भी कहा गया है कि फिल्म बनाने से पहले शाहबानो के परिवार से अनुमति नहीं ली गई। वकील का कहना है कि शाहबानो की बेटी, जो उनकी कानूनी वारिस हैं, के पास उनकी मां की निजी और नैतिक कहानियों पर आधारित अधिकार हैं। लेकिन निर्माताओं ने बिना उनकी जानकारी के फिल्म का निर्माण किया।
निर्माताओं और सेंसर बोर्ड को भेजा गया नोटिस
याचिका दायर होने के बाद कोर्ट ने फिल्म के डायरेक्टर सुपर्ण एस. वर्मा, प्रोडक्शन पार्टनर्स, प्रमोटर्स, और फिल्म को सर्टिफिकेट देने वाली सेंसर अथॉरिटी को लीगल नोटिस जारी किया है। सिद्दिका की याचिका में कहा गया है कि फिल्म ‘हक’ में उनकी मां शाहबानो बेगम के निजी जीवन, परिवारिक संघर्षों, और संवेदनशील सामाजिक परिस्थितियों को चित्रित किया गया है, जो उनकी व्यक्तिगत गरिमा और गोपनीयता का उल्लंघन है। वकील वारसी ने बताया, “मेरी मुवक्किल सिद्दिका बेगम खान के पास अपनी मां की जीवनकथा से जुड़े मोरल और लीगल राइट्स हैं। फिल्म के निर्माताओं ने इन अधिकारों की अनदेखी की और बिना अनुमति फिल्म बना दी, जो कानून के विरुद्ध है।”
7 नवंबर को रिलीज होनी है फिल्म ‘हक’
फिल्म ‘हक’ की रिलीज 7 नवंबर को तय की गई है। इसमें यामी गौतम ने शाहबानो का किरदार निभाया है, जबकि इमरान हाशमी उनके पति मोहम्मद अहमद खान के रूप में नजर आएंगे। फिल्म का निर्देशन सुपर्ण एस. वर्मा ने किया है।
क्या था शाहबानो केस?
शाहबानो बेगम, मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली एक मुस्लिम महिला थीं। उनकी शादी वकील मोहम्मद अहमद खान से हुई थी। विवाह के कई वर्षों बाद उनके पति ने उन्हें तीन तलाक देकर घर से निकाल दिया। तलाक के बाद शाहबानो ने भरण-पोषण (Maintenance) के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया और कहा कि तलाकशुदा महिला को भरण-पोषण का अधिकार है, चाहे वह किसी भी धर्म की हो। यह फैसला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 125 (CrPC) के तहत दिया गया था, जो हर नागरिक को न्याय और समानता का अधिकार देता है। लेकिन इस फैसले का मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया। उनका कहना था कि यह फैसला इस्लामिक शरिया कानून के खिलाफ है, जिसमें तलाकशुदा महिला को सिर्फ ‘इद्दत’ की अवधि (लगभग तीन महीने) तक ही भरण-पोषण देने की अनुमति है।
राजनीतिक दबाव में बदला गया कानून
विवाद बढ़ने पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी सरकार ने 1986 में ‘मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम’ पारित किया। इस कानून में कहा गया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला को भरण-पोषण केवल इद्दत की अवधि तक ही मिलेगा। हालांकि, आने वाले वर्षों में कई न्यायिक फैसलों ने इस सीमित अधिकार की व्याख्या को बदला और महिलाओं को लंबे समय तक मैंटेनेंस मांगने का हक दिया गया।
अब भी जारी है बहस
शाहबानो केस आज भी भारतीय न्याय व्यवस्था और महिला अधिकारों पर सबसे चर्चित मामलों में गिना जाता है। इसने भारतीय समाज में धर्म और कानून के बीच की संवेदनशील बहस को जन्म दिया था। फिल्म ‘हक’ इसी विवादित केस पर आधारित है, और अब वास्तविक परिवार की आपत्ति के बाद मामला फिर से अदालत तक पहुंच गया है। अब देखना यह होगा कि हाई कोर्ट फिल्म की रिलीज पर क्या फैसला सुनाता है — क्या ‘हक’ को थिएटर तक पहुंचने दिया जाएगा या विवाद के चलते इसकी रिलीज टल जाएगी।
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