द देवरिया न्यूज़/तेल अवीव। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) ने गाजा पट्टी और व्यापक फलस्तीन मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति की दिशा में संभावित कदम माना जा रहा है। यह प्रस्ताव अमेरिका की ओर से प्रस्तुत किया गया था और वैश्विक मीडिया में इसे ‘ट्रंप प्रपोज़ल’ के नाम से भी जाना जा रहा है। हालांकि, प्रस्ताव को सर्वसम्मति का समर्थन नहीं मिला। परिषद के दो स्थायी सदस्य—चीन और रूस—ने मतदान का बहिष्कार किया, जबकि वे विरोध की स्थिति में नहीं थे। यदि दोनों देश प्रत्यक्ष रूप से प्रस्ताव का विरोध करते, तो यह वीटो हो जाता।
गौरतलब है कि खाड़ी क्षेत्र के अधिकांश देश इस समय किसी भी कीमत पर क्षेत्र में स्थिरता और हिंसा की समाप्ति चाहते हैं। इसी वजह से रूस और चीन ने सीधे विरोध का रास्ता नहीं अपनाया।
अलग फलस्तीन के गठन की संभावना
हालांकि प्रस्ताव का प्रमुख फोकस गाजा पट्टी है, लेकिन इसमें भविष्य में एक स्वतंत्र फलस्तीन राज्य के संभावित गठन का भी उल्लेख किया गया है। यह बिंदु अमेरिका और इस्राइल दोनों के लिए असहज रहा, लेकिन यूरोपीय और कुछ अरब देशों के दबाव के चलते इसे प्रस्ताव में शामिल किया गया।
गाजा पट्टी के लिए दो प्रमुख प्रावधान
प्रस्ताव की धुरी दो मुख्य पहलुओं पर टिकी है:
1. ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का गठन
यह एक संक्रमणकालीन संस्था होगी, जो गाजा पट्टी का प्रशासन संभालेगी। इसका दायित्व होगा:
मानवीय सहायता का प्रबंधन
गाजा का पुनर्निर्माण
आर्थिक पुनरुद्धार की योजना
अस्थायी प्रशासनिक ढांचे का संचालन
इसके गठन और सदस्य देशों के नाम अभी तय नहीं किए गए हैं, जिसके चलते इसकी निष्पक्षता पर सवाल बने हुए हैं।
2. अंतरराष्ट्रीय बल ‘ISF’ का गठन
‘International Stabilization Force (ISF)’ गाजा का पूरी तरह निःशस्त्रीकरण करने की जिम्मेदारी संभालेगी।
यह बल मिस्र और इस्राइल दोनों के साथ समन्वय कर काम करेगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात—यह कोई संयुक्त राष्ट्र की पारंपरिक पीसकीपिंग फोर्स नहीं होगी।
UN न तो इसके गठन में शामिल है और न ही इसके फंडिंग में।
इस वजह से ISF की निष्पक्षता और संचालन प्रणाली को लेकर व्यापक चिंताएं जताई जा रही हैं। आलोचकों का कहना है कि यह बल कहीं इस्राइल के हितों को आगे बढ़ाने वाली व्यवस्था में न बदल जाए।
इस्राइल की हवाई कार्रवाई जारी, संदेह गहरा
प्रस्ताव पारित होने के बावजूद गाजा क्षेत्र में इस्राइल की लगातार हवाई बमबारी ने संदेह और गहरा कर दिया है। विश्लेषकों का कहना है कि ISF कहीं गाजा पट्टी में मानवीय सहायता या सुरक्षा प्रदान करने के बजाय क्षेत्र को पूर्ण रूप से निःशस्त्र करने के लक्ष्य में ही व्यस्त न दिखाई दे।
महत्वपूर्ण यह भी है कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ किस प्रकार, किन देशों की भागीदारी और किन दिशानिर्देशों के अंतर्गत कार्य करेगा, इसका ढांचा अभी स्पष्ट नहीं है।
यूरोप और खाड़ी देशों का दबाव
इस प्रस्ताव में सबसे अधिक संशोधन यूरोपीय देशों के दबाव के कारण हुए। कई यूरोपीय सरकारें खुलकर स्वतंत्र फलस्तीन राज्य की मान्यता की दिशा में आगे बढ़ चुकी हैं। इनके साथ खाड़ी देशों ने भी अमेरिका पर दबाव बनाया।
खाड़ी देशों का यह हस्तक्षेप महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके अमेरिका और इस्राइल दोनों से मजबूत कूटनीतिक रिश्ते हैं। यदि वे आगे भी सक्रिय बने रहते हैं, तो संभावना है कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ और ‘ISF’ को इस्राइल की एकतरफा नियंत्रण प्रणाली में बदलने से रोका जा सकेगा।
हमास के लिए कड़ा संदेश
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रस्ताव उन ताकतों के लिए भी एक संदेश है जो यह सोचती हैं कि भविष्य में गाजा को फिर से एक किलेबंद क्षेत्र या अर्ध-स्वायत्त सैन्य क्षेत्र बनाया जा सकता है।
7 सितंबर 2023 को इस्राइली नागरिकों पर हमास के हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमास के प्रति विश्वास पूरी तरह टूट चुका है।
दुनिया आम फलस्तीनियों के साथ खड़ी है, लेकिन हथियारबंद गुटों के प्रति समर्थन लगभग समाप्त हो चुका है।
रूस और चीन की भूमिका क्या होगी?
रूस और चीन मतदान से दूर रहे, लेकिन कूटनीतिक हलकों का मानना है कि वे आगे चलकर ISF के स्वरूप पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं। दोनों देशों को इस बात की निगरानी करनी होगी कि ISF, इस्राइल या नाटो की सैन्य संरचना वाली इकाई न बने, बल्कि संयुक्त राष्ट्र की पारदर्शी और मानवीय सिद्धांतों वाली शांति-सेना जैसा आचरण करे।
विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि वैश्विक संस्थाओं का कमजोर होना पहले से ही अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए खतरा है। यदि अंतरराष्ट्रीय बलों के संचालन में पारंपरिक मानकों से और अधिक विचलन हुआ, तो यह भविष्य में बेहद विस्फोटक स्थितियां पैदा कर सकता है।
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