एक तरफ पाकिस्तान आतंकवाद, अलगाववाद और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर उसकी सेना दूसरे देशों को सुरक्षा देने और हथियार बेचने के दावे कर रही है। असीम मुनीर की रणनीति MENA देशों में पाकिस्तानी हथियारों की बिक्री और सैन्य सहयोग बढ़ाने पर केंद्रित बताई जा रही है।
हथियारों के सौदों का दावा और डिप्लोमेसी
पाकिस्तान पर आरोप है कि वह अपने रक्षा उद्योग को लेकर बड़े पैमाने पर प्रोपेगेंडा फैला रहा है, जिसमें कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया समूह भी उसका साथ दे रहे हैं। इस रणनीति के तहत फरवरी के पहले हफ्ते में असीम मुनीर ने लीबिया के बागी सैन्य कमांडर खलीफा हफ्तार से रावलपिंडी स्थित आर्मी हेडक्वार्टर में मुलाकात की। इसे पाकिस्तान की MENA डिप्लोमेसी का अहम हिस्सा बताया गया।
पाकिस्तान का दावा है कि उसने लीबियाई नेशनल आर्मी (LNA) के साथ करीब 4 अरब डॉलर की डील की है, जिसके तहत 16 JF-17 फाइटर जेट और 12 सुपर मुशक ट्रेनर एयरक्राफ्ट सप्लाई किए जाएंगे।
इसके अलावा सूडानी आर्म्ड फोर्सेज (SAF) को 10 कराकोरम-8 लाइट अटैक एयरक्राफ्ट, 200 से ज्यादा ड्रोन और एयर डिफेंस सिस्टम देने के लिए 1.5 अरब डॉलर के समझौते का भी दावा किया गया है।
पाकिस्तान यह भी कहता है कि सऊदी अरब, बांग्लादेश, इंडोनेशिया और इराक जैसे देश उसके JF-17 फाइटर में रुचि दिखा रहे हैं।
खुद असुरक्षित, लेकिन दूसरों को सुरक्षा का दावा
अलजजीरा में रिसर्चर रियाज़ खोखर ने लिखा है कि पाकिस्तानी सेना खुद को MENA क्षेत्र में सुरक्षा गारंटर की तरह पेश कर रही है, जबकि हालात यह हैं कि देश के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ खुद स्वीकार कर चुके हैं कि बलूचिस्तान के 40 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से पर सरकार का प्रभावी नियंत्रण नहीं है।
पिछले साल सितंबर में पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा समझौता हुआ था। इसके साथ ही पाकिस्तान डोनाल्ड ट्रंप के गाजा पीस प्लान का भी हिस्सा बताया जा रहा है और चर्चा है कि वह हमास के खिलाफ लड़ाई के लिए गाजा में अपनी सेना भेज सकता है। इससे सवाल उठ रहे हैं कि जो सेना अपने देश में सुरक्षा नहीं दे पा रही, वह विदेशों में सुरक्षा की गारंटी कैसे दे सकती है।
आर्थिक हकीकत ने खोली पोल
रियाज़ खोखर के मुताबिक, पाकिस्तान के पास इन रक्षा रिश्तों को लंबे समय तक निभाने की आर्थिक क्षमता नहीं है। 2024-25 में पाकिस्तान का कुल नेट फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट सिर्फ 2.5 अरब डॉलर रहा, जबकि गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) देशों के साथ उसका कुल व्यापार करीब 20 अरब डॉलर का है।
इसके उलट, भारत को अकेले 2024 में GCC देशों से 4.7 अरब डॉलर का निवेश मिला और भारत-GCC व्यापार करीब 179 अरब डॉलर तक पहुंच गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था सऊदी अरब और यूएई से मिलने वाले कर्ज और IMF के लोन पर टिकी हुई है, जबकि भारत गल्फ देशों में इंफ्रास्ट्रक्चर, एनर्जी और टेक्नोलॉजी का रणनीतिक निवेशक बन चुका है। यही “डिपेंडेंसी गैप” पाकिस्तान की सीमाएं उजागर करता है।
भारत की बराबरी क्यों नहीं कर सकता पाकिस्तान
विश्लेषकों का कहना है कि गल्फ देश रक्षा सहयोग को सिर्फ हथियारों तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसे एनर्जी, ट्रेड, टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन जैसी व्यापक साझेदारियों से जोड़ते हैं। उदाहरण के तौर पर भारत और यूएई के बीच हाल ही में 3 अरब डॉलर की LNG सप्लाई डील हुई और रणनीतिक रक्षा साझेदारी को और गहरा करने पर सहमति बनी।
अलजजीरा के मुताबिक, पाकिस्तान चाहकर भी इस मॉडल को काउंटर नहीं कर सकता, क्योंकि उसके पास न तो मजबूत अर्थव्यवस्था है और न ही निवेश करने की क्षमता।
कई मोर्चों पर घिरा पाकिस्तान
पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति लगातार बिगड़ रही है। बलूचिस्तान में हाल के महीनों में सबसे घातक हमले हुए, जहां एक साथ 12 शहरों को निशाना बनाया गया। क्वेटा समेत कई इलाकों में सरकारी इमारतों और सुरक्षा ठिकानों पर हमले हुए।
इसी बीच इस्लामाबाद की शिया मस्जिद में हुए बम धमाके की जिम्मेदारी ISIL (ISIS) से जुड़े एक गुट ने ली। तीन महीनों में राजधानी में यह दूसरा बड़ा आतंकी हमला था।
साउथ एशिया विश्लेषक माइकल कुगेलमैन ने लिखा है कि पाकिस्तान इस वक्त अफगानिस्तान, ISIS, बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) और आंतरिक राजनीतिक संकट जैसे कई मोर्चों पर फंसा हुआ है। उनके मुताबिक, अफगानिस्तान-पाकिस्तान की स्थिति अब भारत-पाकिस्तान तनाव से भी ज्यादा अस्थिर हो चुकी है और इससे वैश्विक आतंकवाद को बढ़ावा मिल सकता है। विशेषज्ञों की राय साफ है—पाकिस्तान को पहले अपने घर की सुरक्षा और स्थिरता पर ध्यान देना चाहिए, उसके बाद ही किसी दूसरे देश की रक्षा की बात करनी चाहिए।