द देवरिया न्यूज़/नई दिल्ली : दक्षिण एशिया में बदलते सुरक्षा परिदृश्य के बीच पाकिस्तान ने अपने सैन्य ढांचे में एक बड़ा और रणनीतिक बदलाव करते हुए 27वां संवैधानिक संशोधन पारित कर दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार इस संशोधन की दिशा और संरचना से साफ झलकता है कि पाकिस्तान अपने प्रतिद्वंद्वी भारत की तेजी से बढ़ती सैन्य शक्ति और उसके हालिया संस्थागत सुधारों से प्रभावित हुआ है। प्रश्न यह है कि क्या भारत ने पाकिस्तान की सैन्य रणनीति को पुनर्गठित करने के लिए मजबूर कर दिया है? संकेत यही देते हैं।
भारत के CDS मॉडल की छाया में पाकिस्तान का नया CDF ढांचा
भारत ने 2019 में पहली बार चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) की नियुक्ति की और उसके बाद देश को ज्वाइंट थिएटर कमांड की ओर ले जाने का अभियान शुरू किया। इस कदम ने भारत की तीनों सेनाओं — सेना, नौसेना और वायुसेना — के बीच तालमेल और संचालन क्षमता को पहले से कहीं अधिक मजबूत बनाया। पाकिस्तान में इस सुधार को हल्के में नहीं लिया गया। वहां की सैन्य चर्चाओं में बार-बार यह तर्क उभरा कि भारत के कदम ने “एनफील्ड इफेक्ट” पैदा किया है — जिसका अर्थ है कि यदि भारत एकीकृत कमान संरचना विकसित कर रहा है तो पाकिस्तान को भी प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए इसी दिशा में बढ़ना ही होगा।
इसी क्रम में पाकिस्तान ने चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस (CDF) का नया मॉडल अपनाने की प्रक्रिया शुरू की है। 27वें संशोधन के बाद सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर अब औपचारिक रूप से तीनों सेनाओं के संयुक्त प्रमुख माने जाएंगे और एक अधिक केंद्रीकृत कमान संरचना का नेतृत्व करेंगे। पाकिस्तान में इसे “भारत के CDS मॉडल की शैडो स्ट्रक्चर” तक कहा जा रहा है।
ज्वाइंट थियेटर कमांड को लेकर बढ़ी चिंता
भारत पिछले पाँच वर्षों से अपने थिएटर कमांड मॉडल को मजबूत कर रहा है, जिसमें उत्तरी, पश्चिमी और समुद्री क्षेत्रों में संयुक्त सैन्य नियंत्रण की व्यवस्था शामिल है। पाकिस्तान को यह आशंका है कि यदि भारत अपनी थिएटर-कमांड संरचना को पूरी तरह लागू कर देता है, तो सीमा क्षेत्रों में उसका सामरिक दबाव और अधिक बढ़ सकता है। ऐसे माहौल में पाकिस्तान के लिए अपनी कमान प्रणाली में बदलाव करना रणनीतिक आवश्यकता बन गया।
यह पहली बार नहीं है जब दोनों देशों के सुरक्षा निर्णय एक-दूसरे के प्रभाव में दिखाई दिए हों। 1998 के परमाणु परीक्षणों से लेकर मिसाइल कार्यक्रमों की तेजी तक, और भारत-अमेरिका साझेदारी के बाद पाकिस्तान-चीन सैन्य सहयोग की मजबूती—इतिहास ऐसे ही प्रतिक्रियात्मक कदमों से भरा है।
तकनीकी युद्धों के दौर में नए सुरक्षा कानूनों की जरूरत
भारत जहां ड्रोन-स्वॉर्म, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित निगरानी प्रणाली और लंबी मारक क्षमता वाली मिसाइलों में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है, वहीं पाकिस्तान में यह चिंता उभरी कि उसके पास नई तकनीकी चुनौतियों से निपटने के लिए पर्याप्त कानूनी या प्रशासनिक ढांचा नहीं है। खासकर सीमा क्षेत्रों में बढ़ती ड्रोन घुसपैठ, जासूसी गतिविधियाँ और हाई-टेक युद्धों की तैयारी ने पाकिस्तान को अपने सुरक्षा कानूनों के दायरे को व्यापक बनाने पर मजबूर किया।
पाकिस्तान की राजनीतिक और सैन्य संस्थाओं का मानना है कि यदि कानूनी अधिकार और सैन्य क्षमता अधिक केंद्रीकृत नहीं होगी, तो वह सुरक्षा-प्रतिस्पर्धा में लगातार पीछे होता जाएगा।
दक्षिण एशिया में बदलता शक्ति-संतुलन
पाकिस्तान का इतिहास बताता है कि उसके अधिकांश बड़े सुरक्षा सुधार बाहरी प्रेरणाओं से प्रोत्साहित हुए — चाहे शीत युद्ध काल के सैन्य गठबंधन हों, 1980 का अफगान संकट या 2001 के बाद आतंकवाद-रोधी ढांचे का विस्तार। आज भारत के सैन्य सुधार उसी बाहरी दबाव का नया रूप माने जा रहे हैं।
इसलिए यह सवाल कि “क्या पाकिस्तान को भारत का बढ़ता प्रभाव खौफ में डाल रहा है?” केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि रणनीतिक वास्तविकता का हिस्सा है। यह डर युद्ध का नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन में भारत के पक्ष में झुकाव का है।
27वां संशोधन इसी व्यापक रणनीतिक प्रतिक्रिया का हिस्सा है, जहां घरेलू राजनीति और अंतरराष्ट्रीय दबाव मिलकर पाकिस्तान की सैन्य दिशा तय कर रहे हैं। दक्षिण एशिया में आने वाले वर्षों में यह बदलाव शक्ति समीकरण को किस तरह प्रभावित करेगा, यह आने वाला समय बताएगा।
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