द देवरिया न्यूज़,दोहा : पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच कतर से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां भारतीय नौसेना के पूर्व कमांडर पूर्णेंदु तिवारी को हाईकोर्ट से बरी किए जाने के बावजूद अब तक रिहा नहीं किया गया है। कतर की अदालत ने 12 मार्च को अपने फैसले में तिवारी को वित्तीय गड़बड़ी के सभी आरोपों से मुक्त कर दिया था, लेकिन इसके बावजूद वह अभी भी दोहा की जेल में बंद हैं।
पूर्णेंदु तिवारी उन आठ पूर्व भारतीय नौसैनिकों में शामिल थे, जिन्हें पहले कथित जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। बाद में भारत सरकार के हस्तक्षेप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल के बाद कतर ने इन सभी को माफी दे दी थी। हालांकि, अन्य सात नौसैनिक भारत लौट चुके हैं, लेकिन तिवारी की रिहाई अब तक नहीं हो सकी है।
अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा था कि जिन वित्तीय लेनदेन को लेकर तिवारी पर आरोप लगाए गए थे, वे शिकायतकर्ता की सहमति से किए गए थे और उनमें किसी तरह का आपराधिक इरादा नहीं था। इसके बावजूद उनकी रिहाई में हो रही देरी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
तिवारी के परिवार ने इस मामले को लेकर गहरी चिंता जताई है। उनकी 87 वर्षीय मां अपने बेटे की वापसी का इंतजार कर रही हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि वह कब घर लौट पाएंगे। परिवार का कहना है कि कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद उन्हें लगातार कानूनी और हिरासत संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। लंबे समय से जेल में रहने के कारण तिवारी की सेहत भी खराब होती जा रही है।
तिवारी की बहन मीतू भार्गव ने कहा कि जब उनके भाई के खिलाफ कोई ठोस मामला नहीं था और अन्य सभी आरोपियों को रिहा कर दिया गया, तो उन्हें भी तुरंत रिहा किया जाना चाहिए था। उन्होंने आरोप लगाया कि दहरा ग्लोबल कंपनी के सीईओ ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर उनके भाई को फंसाया।
परिवार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्रालय से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप की अपील की है। उनका कहना है कि भारत सरकार को कतर से बातचीत कर पूर्णेंदु तिवारी की जल्द से जल्द रिहाई सुनिश्चित करनी चाहिए।
गौरतलब है कि पूर्णेंदु तिवारी भारतीय नौसेना के अनुभवी अधिकारी रहे हैं और INS Magar जैसे युद्धपोत की कमान संभाल चुके हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने दहरा ग्लोबल कंपनी जॉइन की थी, जो कतर की नौसेना को प्रशिक्षण देती है। उन्हें प्रवासी भारतीय सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। इस पूरे मामले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींचा है और यह सवाल उठ रहा है कि अदालत से बरी होने के बावजूद किसी व्यक्ति को हिरासत में रखना किस हद तक न्यायसंगत है।
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