Breaking News
ट्रेंडिंग न्यूज़देवरिया न्यूज़उत्तर प्रदेश न्यूज़राष्ट्रीय न्यूज़अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़राजनीतिक न्यूज़अपराधिक न्यूज़स्पोर्ट्स न्यूज़एंटरटेनमेंट न्यूज़बिज़नस न्यूज़टेक्नोलॉजी अपडेट लेटेस्ट गैजेट अपडेटमौसम

संसद में राइट टू रिकॉल की मांग, राघव चड्ढा बोले—काम न करने वाले जनप्रतिनिधियों को हटाने का हक मिले

Published on: February 12, 2026
Demand for Right to Recall in Parliament
द देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने बुधवार को संसद में राइट टू रिकॉल यानी जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने के अधिकार का मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सिर्फ चुनाव जीतना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। अगर कोई सांसद या विधायक अपने काम से मतदाताओं को संतुष्ट नहीं कर पाता, तो जनता को उसे पद से हटाने का अधिकार मिलना चाहिए।
राघव चड्ढा ने सदन में कहा कि राइट टू रिकॉल की व्यवस्था दुनिया के करीब 24 देशों में किसी न किसी रूप में लागू है। उन्होंने बताया कि भारत में भी राजस्थान और कर्नाटक जैसे राज्यों में पंचायत स्तर पर यह व्यवस्था पहले से मौजूद है, जहां जनप्रतिनिधियों के कामकाज से असंतुष्ट होने पर मतदाता उन्हें वापस बुला सकते हैं।
आप सांसद के मुताबिक, राइट टू रिकॉल मतदाताओं के लिए एक तरह का “इंश्योरेंस सिस्टम” होगा। इससे जनता को यह भरोसा मिलेगा कि चुनाव जीतने के बाद अगर कोई प्रतिनिधि क्षेत्र की उपेक्षा करता है या जनता को भूल जाता है, तो वही मतदाता उसे दिया गया जनादेश वापस ले सकते हैं। हालांकि, इस मुद्दे पर सदन के कई सदस्य उनसे सहमत नजर नहीं आए।
राघव चड्ढा ने तर्क दिया कि जब संविधान में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और अन्य संवैधानिक पदाधिकारियों को हटाने की प्रक्रिया का प्रावधान है, तो आम जनता द्वारा चुने गए सांसदों और विधायकों के लिए ऐसा अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि राइट टू रिकॉल तभी लागू हो, जब किसी निर्वाचन क्षेत्र के कुल मतदाताओं में से कम से कम 50 प्रतिशत लोग इसके पक्ष में हों। इससे इस व्यवस्था के दुरुपयोग की आशंका भी कम होगी।
उन्होंने यह भी बताया कि अलग-अलग देशों में राइट टू रिकॉल की व्यवस्था अलग स्तरों पर लागू है। कहीं यह राष्ट्रपति तक पर लागू होती है, तो कहीं सांसदों, विधायकों या स्थानीय निकायों तक सीमित है। अमेरिका के कुछ राज्यों, कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया, स्विट्जरलैंड के कुछ कैंटन, ताइवान, जापान, वेनेजुएला, मेक्सिको और बोलीविया जैसे देशों में यह व्यवस्था मौजूद है। भारत और नेपाल में भी यह अधिकार फिलहाल स्थानीय निकायों तक सीमित है।
राघव चड्ढा का कहना है कि अगर भारत में राइट टू रिकॉल को व्यापक रूप से लागू किया जाए, तो इससे लोकतंत्र और मजबूत होगा और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही भी बढ़ेगी।

इसे भी पढ़ें : सिंधु जल संधि निलंबन के बाद भारत का बड़ा कदम, झेलम–चिनाब की लंबित परियोजनाओं पर जल्द शुरू होगा काम

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Reply