बिहार विधानसभा चुनाव से पहले एक अध्ययन रिपोर्ट ने सूबे की विधानसभा की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च (PRS Legislative Research) की रिपोर्ट के अनुसार, 2020 से 2025 के बीच 17वीं बिहार विधानसभा की कुल बैठकें सिर्फ 146 दिन हुईं — जो पिछले सभी कार्यकालों में सबसे कम है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस अवधि में विधानसभा औसतन हर साल 29 दिन चली और हर दिन की बैठक करीब तीन घंटे की रही। यह संख्या देश के अन्य राज्यों की विधानसभाओं की तुलना में भी बेहद कम है।
🔹 ऐतिहासिक तुलना में भारी गिरावट
स्वतंत्रता के बाद पहली बिहार विधानसभा ने 391 दिन और दूसरी विधानसभा ने 434 दिन तक बैठक की थी। लेकिन इसके बाद बैठकों की संख्या लगातार घटती चली गई। 1980 से 1985 की आठवीं विधानसभा के दौरान यह घटकर 208 दिन रह गई थी। अब 17वीं विधानसभा में यह आंकड़ा 146 पर आकर रुक गया है, जो अब तक का सबसे न्यूनतम रिकॉर्ड है।
🔹 बिना समीक्षा के पारित हुए सभी विधेयक
रिपोर्ट के अनुसार, 17वीं विधानसभा के दौरान कुल 78 विधेयक (Bills) पारित किए गए। चौंकाने वाली बात यह रही कि इनमें से एक भी विधेयक समीक्षा या किसी समिति (Committee) के पास विचार के लिए नहीं भेजा गया।
सभी विधेयक उसी दिन पास कर दिए गए, जिस दिन उन्हें सदन में पेश किया गया था।
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इनमें प्रमुख रूप से शामिल रहे —
बिहार सार्वजनिक परीक्षा (अवैध साधनों की रोकथाम) विधेयक, 2024
बिहार अपराध नियंत्रण विधेयक, 2024
प्लेटफॉर्म आधारित गिग वर्कर्स (पंजीकरण, सुरक्षा और कल्याण) विधेयक, 2025
इसके अलावा, वर्ष 2023 में दो विधेयक पारित किए गए थे जिनके तहत सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण बढ़ाने का प्रस्ताव था। हालांकि, इन्हें पटना हाईकोर्ट ने जून 2024 में असंवैधानिक बताते हुए निरस्त कर दिया।
🔹 सीमित चर्चा और खर्च समीक्षा
रिपोर्ट में बताया गया कि इस पांच साल के कार्यकाल के दौरान विधानसभा में वार्षिक बजट और मुख्य विभागों के खर्चों पर चर्चा तो हुई, लेकिन उसका समय बेहद सीमित रहा।
2020 से अब तक औसतन 9 दिन ही मंत्रालयों के खर्चों पर चर्चा हुई, जो कि लोकतांत्रिक विमर्श की दृष्टि से चिंताजनक माना जा रहा है।
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🔹 बिहार चुनाव की पृष्ठभूमि में रिपोर्ट का महत्व
यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब बिहार में दो चरणों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं।
पहला चरण 6 नवंबर और दूसरा चरण 11 नवंबर को होगा, जबकि मतगणना 14 नवंबर 2025 को की जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह रिपोर्ट सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्ष — दोनों के लिए राजनीतिक बहस का विषय बनेगी, क्योंकि यह राज्य में विधानसभा की कार्य संस्कृति और जवाबदेही पर गहरा प्रश्न खड़ा करती है।
निष्कर्ष:
बिहार विधानसभा की कार्यवाही में इस तरह की गिरावट राज्य के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए चिंता का विषय है।
जहां पहले विधायक जनता के मुद्दों पर विस्तृत बहस करते थे, वहीं अब विधेयक बिना समीक्षा के पास हो रहे हैं।
आगामी चुनाव में यह सवाल जरूर उठेगा कि आखिर बिहार विधानसभा की “बैठकें” इतनी कम क्यों रह गईं और क्या यह जनता के प्रतिनिधित्व की भावना के अनुरूप है?
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