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बरेली के निजी अस्पताल की अमानवीयता: इलाज के बाद मौत, पैसे पूरे न होने पर शव देने से इनकार

Published on: December 22, 2025
Inhumanity of private hospital of Bareilly
द देवरिया न्यूज़,बरेली : उत्तर प्रदेश के बरेली स्थित एक निजी अस्पताल से इंसानियत को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। बदायूं जिले के एक युवक की इलाज के दौरान मौत के बाद अस्पताल प्रबंधन ने उसके गरीब पिता से बकाया रकम वसूलने के लिए शव देने से ही इनकार कर दिया। मजबूर पिता को गांव-गांव और लोगों के सामने हाथ फैलाकर पैसे जुटाने पड़े, तब जाकर वह अपने बेटे का शव घर ले जा सका। इस घटना ने हर संवेदनशील व्यक्ति की आंखें नम कर दी हैं।
बदायूं जिले के दातागंज कोतवाली क्षेत्र के गांव नगरिया निवासी सोमनाथ वाल्मीकि का 26 वर्षीय बेटा धर्मपाल एक दिसंबर को सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गया था। परिजनों ने उसे पहले सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया, लेकिन वहां समुचित इलाज न मिलने के कारण वे उसे बरेली के एक निजी अस्पताल ले गए। सोमनाथ के अनुसार, अस्पताल में भर्ती करते समय इलाज के नाम पर पहले ही करीब तीन लाख रुपये जमा कराए गए।
करीब 14 दिनों तक युवक का इलाज चला और इस दौरान अस्पताल का बिल बढ़कर 6 लाख 10 हजार रुपये तक पहुंच गया। 14 दिसंबर को डॉक्टरों ने परिजनों को सूचित किया कि धर्मपाल की मौत हो चुकी है। इसके बाद अस्पताल प्रबंधन ने शव सौंपने से पहले 3 लाख 10 हजार रुपये और जमा करने की मांग रख दी। सोमनाथ ने बताया कि उनके पास जितनी भी जमा पूंजी थी, वह इलाज में पहले ही खर्च हो चुकी थी।
पिता का आरोप है कि रकम न दे पाने के कारण अस्पताल ने शव देने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने डॉक्टरों और अस्पताल स्टाफ से हाथ जोड़कर मिन्नतें कीं, लेकिन किसी ने उनकी मजबूरी नहीं समझी। निराश और टूटे हुए सोमनाथ बिना बेटे का शव लिए ही गांव लौट आए।
गांव पहुंचकर उन्होंने परिचितों और ग्रामीणों से मदद की गुहार लगाई। किसी तरह लोगों से पैसे जुटाकर वे दोबारा अस्पताल पहुंचे और 2.80 लाख रुपये जमा किए। इसके बावजूद 30 हजार रुपये कम होने का हवाला देकर शव देने से मना कर दिया गया। आखिरकार मजबूर पिता पुलिस थाने पहुंचे, जहां पुलिस के हस्तक्षेप के बाद उन्हें बेटे का शव सौंपा गया।
सोमनाथ वाल्मीकि ने बताया कि बेटे के इलाज के लिए उन्होंने पहले ही डेढ़ लाख रुपये में अपना घर गिरवी रख दिया था। इसके बाद भी पैसे कम पड़े तो उधार लेना पड़ा और लोगों से मदद मांगनी पड़ी। इस दर्दनाक घटना ने निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली और गरीब मरीजों के साथ हो रहे व्यवहार पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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