द देवरिया न्यूज़,पेरिस/तेहरान : पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडराते संकट के बीच भारत और फ्रांस ने मिलकर बड़ा कदम उठाया है। दोनों देशों ने इस अहम समुद्री मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करने और वैश्विक व्यापार को प्रभावित होने से बचाने के लिए समन्वय बढ़ाने पर सहमति जताई है।
गुरुवार को पेरिस के पास आयोजित जी7 देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सहयोगी देश के रूप में हिस्सा लिया। इस दौरान पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को कम करने और कूटनीतिक समाधान तलाशने पर व्यापक चर्चा हुई।
जी7 बैठक से इतर जयशंकर और फ्रांस के विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरो के बीच द्विपक्षीय बातचीत भी हुई, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और समुद्री आवाजाही को सुचारू बनाए रखने पर विशेष जोर दिया गया। फ्रांस की ओर से जारी बयान में कहा गया कि दोनों देशों ने इस संवेदनशील मुद्दे पर आपसी तालमेल और सहयोग को और मजबूत करने पर सहमति जताई है।
बैठक के दौरान जयशंकर ने पश्चिम एशिया युद्ध के व्यापक प्रभावों को भी उजागर किया। उन्होंने खास तौर पर ‘ग्लोबल साउथ’ की चिंताओं को सामने रखते हुए ऊर्जा संकट, उर्वरक आपूर्ति और खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दों को उठाया। इसके अलावा उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार, शांति अभियानों के बेहतर प्रबंधन और मानवीय आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने की जरूरत पर भी बल दिया।
इसी बीच फ्रांसीसी नौसेना प्रमुख एडमिरल निकोलस वौजुर ने जानकारी दी कि उन्होंने भारत, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली और जापान सहित कई देशों के नौसैनिक अधिकारियों से बातचीत की है। इस बातचीत का उद्देश्य पश्चिम एशिया की मौजूदा स्थिति पर साझा रणनीति बनाना और समुद्री सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर तालमेल बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि “नौवहन की स्वतंत्रता और समुद्री सुरक्षा वैश्विक अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बेहद अहम हैं।”
गौरतलब है कि भारत और फ्रांस दोनों ही पिछले कुछ दिनों से ईरान के संपर्क में हैं। मौजूदा हालात में होर्मुज जलडमरूमध्य का विशेष महत्व है, क्योंकि यह दुनिया के सबसे अहम तेल परिवहन मार्गों में से एक है।
हालांकि, ईरान ने हाल ही में संकेत दिया है कि भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान और इराक जैसे ‘मित्र देशों’ के जहाजों को इस मार्ग से गुजरने की अनुमति दी जाएगी। वहीं, ईरान ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसके विरोधी देशों और उनके सहयोगियों से जुड़े जहाजों पर पाबंदी जारी रह सकती है।
कुल मिलाकर, भारत और फ्रांस की यह पहल वैश्विक स्तर पर समुद्री सुरक्षा बनाए रखने और पश्चिम एशिया संकट के बीच स्थिरता लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
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