द देवरिया न्यूज़ /नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी. आर. गवई ने शनिवार को अपने विदाई समारोह में अपने पूरे न्यायिक कार्यकाल का सबसे अहम फैसला बताते हुए कहा कि ‘बुलडोजर न्याय’ के खिलाफ दिया गया निर्णय उनके करियर का सबसे निर्णायक क्षण था। उन्होंने कहा कि कानून का राज सिर्फ एक सिद्धांत नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों की अंतिम सुरक्षा है, और जब शासन बल का प्रयोग कर इसे रौंदने की कोशिश करता है, वहां न्यायपालिका को ढाल बनकर खड़ा होना पड़ता है।
CJI गवई ने कहा,
“किसी भी अपराध के आरोप भर से किसी व्यक्ति के घर को गिरा देना कानून के शासन के खिलाफ है। दोष साबित होने तक हर नागरिक निर्दोष है। फिर उसके परिवार का क्या दोष? रहने का अधिकार मौलिक अधिकार है, इसे बुलडोज़र से नहीं कुचला जा सकता।”
क्या था सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला?
नवंबर 2024 में सीजेआई गवई की अध्यक्षता वाली बेंच ने उत्तर प्रदेश समेत देशभर में ‘बुलडोजर न्याय’ की बढ़ती प्रवृत्ति पर सख्त टिप्पणी की थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि:
आरोप के आधार पर घर गिराना असंवैधानिक है
फैसले का लागू होना गंभीर अपराधों के दोषियों पर भी समान रूप से लागू
किसी भी कार्रवाई में प्राकृतिक न्याय, उचित प्रक्रिया और नागरिक अधिकारों का पालन अनिवार्य
यह फैसला न केवल भारत में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय न्याय मंचों पर भी गवई ने उदाहरण के तौर पर रखा और कहा कि यह निर्णय भारत में संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का प्रतीक है।
SC/ST सब-क्लासिफिकेशन पर भी बोले गवई
अपने संबोधन में CJI गवई ने एक और बड़े फैसले का जिक्र किया—राज्यों को SC और ST वर्गों के भीतर उप-वर्गीककरण (sub-classification) की अनुमति देने वाला निर्णय।
उन्होंने कहा,
“समानता का मतलब सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करना नहीं है। ऐसा करने से असमानता और बढ़ेगी।”
डॉ. भीमराव अंबेडकर का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय का मतलब अवसर की पुनर्संरचना है, न कि सतही समानता।
इस दौरान उन्होंने अपने एक लॉ क्लर्क का वाकया साझा किया, जो एक उच्च पदस्थ अधिकारी का बेटा था और SC वर्ग से था। क्लर्क ने कहा कि वह आरक्षण नहीं लेगा क्योंकि परिवार में पहले से सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं। CJI ने इसे समावेशी न्याय और आत्मचेतना की मिसाल बताया।
“संस्था को ऊपर रखा, अहं को नहीं” – सहकर्मियों को धन्यवाद
CJI गवई ने कहा कि उन्होंने हमेशा पारंपरिक न्यायिक दृष्टिकोण से हटकर निर्णय लेने की कोशिश की और हर संस्था-संबंधी फैसले में सहयोगियों से चर्चा की। अपने छोटे कार्यकाल में उन्होंने 107 उच्च न्यायालय न्यायाधीशों की नियुक्ति का उल्लेख किया और सहकर्मियों को साथ बनाए रखने के लिए धन्यवाद दिया।
उन्होंने अपने 40 साल के सफर को याद करते हुए कहा:
18 साल वकालत में
22 साल संवैधानिक अदालतों में न्यायाधीश के रूप में
उन्होंने कहा कि यह सफर सिर्फ कानून का नहीं बल्कि संविधान के जीवित दस्तावेज को समाज में लागू होते हुए देखने का अनुभव रहा।
निष्कर्ष: न्याय की राह पर छोड़ी अमिट छाप
CJI गवई का कार्यकाल भले समय में छोटा रहा, लेकिन उनके फैसले आने वाले वर्षों में भारत की न्याय प्रणाली और नागरिक अधिकारों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
उनका संदेश साफ था—
“राज्य की ताकत कानून से बड़ी नहीं हो सकती। न्याय का पहला कर्तव्य है सत्ता को संविधान के आगे झुकाना।”
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