द देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के नोएडा में एक महिला वकील के साथ कथित बदसलूकी, अवैध हिरासत और यौन उत्पीड़न के मामले ने गंभीर रूप ले लिया है। इस मामले में महिला वकील के आरोपों के बाद अब नोएडा पुलिस सवालों के घेरे में आ गई है। प्रकरण सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है, जहां देश की सर्वोच्च अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सख्त रुख अपनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि घटना से जुड़े पुलिस थाने के सीसीटीवी फुटेज किसी भी कीमत पर डिलीट नहीं किए जाएं। अदालत ने नोएडा पुलिस को आदेश दिया है कि संबंधित समयावधि का पूरा CCTV फुटेज 17 दिनों के भीतर सीलबंद लिफाफे में कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।
क्या है पूरा मामला
पीड़ित महिला एक प्रैक्टिसिंग वकील हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि 3 दिसंबर की रात वह अपने एक क्लाइंट की सुरक्षा और एफआईआर दर्ज कराने के सिलसिले में नोएडा के सेक्टर-126 थाना पहुंची थीं। इसी दौरान पुलिसकर्मियों ने उन्हें ही अवैध रूप से हिरासत में ले लिया। महिला वकील का दावा है कि उन्हें करीब 14 घंटे तक थाने में बैठाकर रखा गया और इस दौरान उनके साथ शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना की गई।
महिला वकील ने आरोप लगाया है कि पुलिसकर्मियों ने उनके साथ यौन उत्पीड़न किया, धमकियां दीं और उन्हें फर्जी एनकाउंटर में मारे जाने की बात कहकर डराया। इतना ही नहीं, उनका यह भी कहना है कि एक पुलिसकर्मी ने उनके सिर पर सरकारी पिस्तौल तानकर मोबाइल फोन का पासवर्ड बताने के लिए मजबूर किया।
कोट फाड़ने और तलाशी का आरोप
अपनी याचिका में महिला वकील ने दावा किया है कि थाने में SHO समेत अन्य पुरुष पुलिसकर्मियों ने उनके साथ अभद्रता की, जबरन उनका वकील का कोट फाड़ दिया गया और गुप्त रूप से वीडियो रिकॉर्डिंग की आशंका में उनके शरीर और कपड़ों की तलाशी ली गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें यौन धमकियां दी गईं और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।
याचिका के अनुसार, दबाव और डर के माहौल में महिला वकील और उनके क्लाइंट के मोबाइल फोन से कथित वीडियो और अन्य डिजिटल सबूत भी जानबूझकर डिलीट करा दिए गए।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
इस मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा कि आमतौर पर ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट सीधे हस्तक्षेप नहीं करता, लेकिन आरोपों की गंभीरता और CCTV फुटेज को लेकर उठे सवालों को देखते हुए इस मामले को अपवाद के रूप में सुना जा रहा है।
अदालत ने इसे “CCTV फुटेज को ब्लॉक करने से जुड़ा गंभीर मामला” बताया और कहा कि पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरों का चालू रहना और रिकॉर्ड सुरक्षित रखना पहले से ही एक अहम मुद्दा रहा है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को नोटिस जारी करते हुए 7 जनवरी तक जवाब मांगा है और गौतम बुद्ध नगर के पुलिस कमिश्नर को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि संबंधित अवधि का कोई भी फुटेज नष्ट न हो।
सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने की मजबूरी
महिला वकील ने अपनी याचिका में कहा है कि उन्हें अपनी जान और आजादी पर खतरा महसूस हुआ, जिसके चलते किसी अन्य विकल्प के अभाव में उन्हें सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद नोएडा पुलिस की भूमिका और जवाबदेही पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।
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