महिला श्रम भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में महिला श्रम बल भागीदारी दर में पिछले कुछ वर्षों में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 2017-18 में यह दर 23.3% थी, जो 2023-24 में बढ़कर 41.7% तक पहुंच गई है। श्वेत पत्र का कहना है कि यह बदलाव सामाजिक परिवर्तनों के साथ-साथ कानूनी सुधारों का भी परिणाम है।
महिलाओं के हित में बने कानूनों की अहम भूमिका
रिपोर्ट में बताया गया कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 और कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (निवारण) अधिनियम, 2013 जैसे कानूनों के साथ-साथ मिशन शक्ति, नव्या और वाइज-किरण जैसी सरकारी पहलों ने महिलाओं की भागीदारी को मजबूत आधार दिया है। नए लेबर कोड्स पुराने कानूनों को सरल और एकीकृत ढांचे में समाहित कर रोजगार कानूनों का आधुनिकीकरण करते हैं।
मातृत्व और सामाजिक सुरक्षा पर खास जोर
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के तहत मातृत्व संरक्षण को बनाए रखा गया है। इसके अंतर्गत पात्र महिला कर्मचारियों को 26 सप्ताह का सवेतन मातृत्व अवकाश मिलेगा, जबकि दत्तक और सरोगेसी माताओं के लिए 12 सप्ताह का अवकाश जारी रहेगा। नर्सिंग ब्रेक, चिकित्सकीय सहायता और दस्तावेजी प्रक्रियाओं को सरल बनाने जैसे प्रावधानों को भी महिलाओं के लिए राहतकारी बताया गया है।
ESI और गिग वर्कर्स तक विस्तार
श्वेत पत्र में कर्मचारी राज्य बीमा (ESI) कवरेज के विस्तार को भी महत्वपूर्ण बताया गया है, जिसे अब सभी उद्योगों और जिलों, यहां तक कि प्लांटेशन सेक्टर तक लागू किया गया है, जहां बड़ी संख्या में महिलाएं कार्यरत हैं। इसके साथ ही गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना महिलाओं के लिए दूरदर्शी कदम माना गया है, खासकर उन महिलाओं के लिए जो घरेलू जिम्मेदारियों के कारण लचीले काम पर निर्भर रहती हैं।
रात की शिफ्ट में काम का अवसर
व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य स्थितियां संहिता के तहत महिलाओं को उनकी सहमति और पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था के साथ रात की शिफ्ट सहित सभी प्रतिष्ठानों में काम करने की अनुमति दी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह आईटी, स्वास्थ्य, विमानन और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की आय और करियर प्रगति में बाधा बनने वाली ‘अदृश्य छत’ को तोड़ने वाला कदम है।
प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी
हालांकि, श्वेत पत्र ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक बदलाव इस बात पर निर्भर करेगा कि नियोक्ता इन प्रावधानों को किस तरह लागू करते हैं, बाजार का सहयोग कैसा रहता है और सहायक संस्थाएं कितनी प्रभावी भूमिका निभाती हैं।