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“तमिल विशिष्टता को नफ़रत में बदल दिया गया… तमिल नेताओं ने भाषा के लिए कुछ नहीं किया”—तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि का बड़ा आरोप

Published on: November 26, 2025
Tamil exceptionalism turned into hatred
द देवरिया न्यूज़ : तमिल बनाम हिंदी का मुद्दा तमिलनाडु की राजनीति में हमेशा गरम रहता है। इसी बीच राज्यपाल आर.एन. रवि ने एक साक्षात्कार में ऐसा बयान दिया है जिसने राज्य की राजनीति में फिर हलचल मचा दी है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु की राजनीति क्षेत्रवाद नहीं, बल्कि ‘तमिल विशिष्टता’ के नाम पर पैदा की गई एक ऐसी राजनीतिक सोच है, जिसमें तमिल को बाकी भाषाओं से अलग और श्रेष्ठ दिखाने का प्रयास किया जाता है। राज्यपाल ने कहा कि यह तमिल विशिष्टता अक्सर इस रूप में सामने आती है कि तमिल के अलावा अन्य भाषाओं—यहां तक कि द्रविड़ मूल की भाषाओं जैसे तेलुगू, कन्नड़ और मलयालम—के प्रति भी तीखी भावनाएं देखी जाती हैं। उन्होंने कहा कि यह विरोध केवल हिंदी तक सीमित नहीं है।
राज्यपाल रवि ने डीएमके और तमिलनाडु के सियासी दलों पर बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि “जो नेता तमिल के नाम पर राजनीति करते हैं, वे वास्तव में तमिल भाषा से प्रेम नहीं करते।”
उनके अनुसार, तमिल भाषा और संस्कृति को बचाने और बढ़ावा देने के लिए नेताओं ने कभी ठोस कदम नहीं उठाए।
उन्होंने दावा किया कि राज्य में तमिल भाषा की स्थिति चिंताजनक है।
“हर साल बच्चे तमिल माध्यम छोड़कर अंग्रेज़ी माध्यम चुन रहे हैं। तमिल में पढ़ने वालों की संख्या तेजी से घट रही है,” उन्होंने कहा।
राज्यपाल ने यह भी बताया कि तमिल संस्कृति के संरक्षण के लिए सरकार लगभग शून्य बजट देती है। राज्य अभिलेखागार में मौजूद 11 लाख से अधिक ताड़पत्र पांडुलिपियां सड़ रही हैं, क्योंकि इनके संरक्षण के लिए कोई आर्थिक सहायता नहीं दी गई।
अक्टूबर 2024 में दूरदर्शन के एक कार्यक्रम के दौरान ‘तमिल थाई वजथु’ को लेकर हुए विवाद पर भी उन्होंने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम में आयोजकों से गलती हुई थी और उन्होंने सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी थी।
रवि ने कहा, “मैं तमिल थाई वजथु कई ऐसे लोगों से बेहतर गा सकता हूं जो तमिल बोलते हैं।” राज्यपाल और डीएमके सरकार के बीच टकराव का जिक्र करते हुए उन्होंने जनवरी में विधानसभा के पहले सत्र से वॉकआउट को एक “दुखद क्षण” बताया। उन्होंने कहा कि यह इसलिए हुआ क्योंकि सत्र की शुरुआत राष्ट्रगान से नहीं की गई, जबकि ऐसे कार्यक्रमों में यह परंपरा है।
राज्यपाल के इस बयान ने तमिलनाडु के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर भाषा और पहचान की बहस को गर्म कर दिया है।

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