जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी. बी. वराले की पीठ ने यह स्पष्टीकरण राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) की ओर से दायर एक आवेदन पर 20 जनवरी को दिए आदेश में किया। NALSA ने कोर्ट को बताया था कि अलग-अलग हाई कोर्ट मुआवजे की राशि को लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण अपना रहे हैं, जिससे असमानता पैदा हो रही है।
अलग-अलग हाई कोर्ट, अलग मुआवजा
सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2023 में मैनुअल सीवर सफाई से हुई मौत के मामलों में मुआवजे की राशि 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दी थी। इसके बावजूद, कुछ हाई कोर्ट पुराने मानकों के आधार पर फैसले दे रहे थे।
उदाहरण के तौर पर, मद्रास हाई कोर्ट ने एक मामले में 10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया, जबकि दिल्ली हाई कोर्ट ने इसी तरह के एक मामले में मुआवजा बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दिया।
विधवा की याचिका से आया स्पष्टीकरण
यह आदेश 2022 में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान जान गंवाने वाले एक सीवर सफाईकर्मी की विधवा की याचिका पर आया है। महिला ने कोर्ट को बताया कि अगस्त 2023 में राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के आदेश के बावजूद उन्हें अब तक मुआवजा नहीं मिला है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मुआवजा 30 लाख रुपये के हिसाब से देने का निर्देश दिया और यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला पहले के लंबित मामलों पर भी लागू होगा, बशर्ते मुआवजा अब तक तय या भुगतान न किया गया हो।
नजीर बनेगा सुप्रीम कोर्ट का आदेश
शीर्ष अदालत के इस स्पष्टीकरण से देशभर में एक समान व्यवस्था लागू होगी। कोर्ट ने साफ किया है कि अक्टूबर 2023 का फैसला मैनुअल सीवर सफाई से मौत के मामलों में एक नजीर के तौर पर माना जाएगा, जिससे पीड़ित परिवारों को न्याय और समान मुआवजा सुनिश्चित हो सके।