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ईरान-अमेरिका जंग के बीच श्रीलंका पर दबाव, 252 ईरानी नौसैनिकों को लेकर फंसा कूटनीतिक संकट

Published on: March 27, 2026
Sri Lanka amid Iran-America war
द  देवरिया न्यूज़,वॉशिंगटन/कोलंबो : ईरान और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष का असर अब हिंद महासागर तक पहुंच गया है, जहां श्रीलंका खुद को एक जटिल कूटनीतिक संकट में फंसा हुआ पा रहा है। तटस्थ रहने की नीति अपनाने वाला श्रीलंका इस समय अमेरिका और ईरान दोनों के दबाव में है, और मामला ईरानी नौसेना के 252 नौसैनिकों की वापसी से जुड़ा हुआ है।

दरअसल, हालिया घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब अमेरिका और ईरान दोनों ने श्रीलंका में सैन्य गतिविधियों के लिए अनुमति मांगी। अमेरिका ने अपने मिसाइलों से लैस फाइटर जेट को मट्टाला एयरपोर्ट पर उतारने की इजाजत चाही, जबकि ईरान ने अपने तीन युद्धपोतों को श्रीलंका में रुकने की अनुमति मांगी। श्रीलंका ने तटस्थता का हवाला देते हुए दोनों ही अनुरोध ठुकरा दिए।

इसके बाद 4 मार्च को स्थिति अचानक गंभीर हो गई, जब अमेरिकी परमाणु पनडुब्बी ने ईरान के युद्धपोत IRIS Dena को श्रीलंका के विशेष आर्थिक क्षेत्र में टॉरपीडो से निशाना बनाकर डुबो दिया। इस हमले में 87 ईरानी नौसैनिकों की मौत हो गई, जबकि कई को श्रीलंका की सेना ने भारत की मदद से बचाया। फिलहाल श्रीलंका में ईरान के कुल 252 नौसैनिक मौजूद हैं। इनमें 32 नौसैनिक IRIS Dena के बचे हुए हैं, जबकि 221 नौसैनिक दूसरे जहाज IRIS Bushehr से जुड़े हैं, जिसे बाद में श्रीलंका ने रुकने की अनुमति दे दी थी। श्रीलंका ने मृत नौसैनिकों के शव ईरान को सौंप दिए, जिसकी तेहरान ने सराहना भी की।

अब असली संकट इन जीवित नौसैनिकों की वापसी को लेकर खड़ा हो गया है। ईरान चाहता है कि उसके सभी नौसैनिकों को जल्द से जल्द वापस भेजा जाए और इसे वह द्विपक्षीय मामला बता रहा है। वहीं अमेरिका ने श्रीलंका पर दबाव बनाया है कि वह इन नौसैनिकों को वापस न भेजे। अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि ये नौसैनिक संभावित रूप से खुफिया एजेंट हो सकते हैं और उनके ईरान लौटने से क्षेत्रीय सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

श्रीलंका के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसकी आर्थिक और सामरिक निर्भरता है। अमेरिका श्रीलंका का प्रमुख निर्यात बाजार है, जहां वह हर साल करीब 3 अरब डॉलर का सामान भेजता है, जिसमें 40 प्रतिशत कपड़ा उद्योग शामिल है। दूसरी ओर, श्रीलंका अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है, जहां से तेल होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है—जिस पर ईरान का प्रभाव है।

इस दबाव के बीच श्रीलंका ने फिलहाल सभी ईरानी नौसैनिकों को एक महीने का वीजा दे दिया है, ताकि स्थिति को संभालने के लिए समय मिल सके। लेकिन यह साफ है कि यह अस्थायी समाधान है और आने वाले दिनों में श्रीलंका को एक बड़ा और संवेदनशील फैसला लेना होगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि श्रीलंका की यह स्थिति “एक तरफ कुआं, दूसरी तरफ खाई” जैसी है, जहां किसी एक पक्ष का साथ देने पर दूसरे की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि कोलंबो अपनी तटस्थ नीति को कैसे संतुलित करता है और इस कूटनीतिक संकट से कैसे बाहर निकलता है।

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