द देवरिया न्यूज़,नई दिल्ली: संसद के शीतकालीन सत्र में हाल ही में एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया गया है, जिसने काम और निजी जीवन के संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। इस विधेयक का नाम ‘राइट टू डिसकनेक्ट बिल 2025’ है। बिल का उद्देश्य कर्मचारियों को यह अधिकार देना है कि वे काम के तय घंटों के बाद ऑफिस से जुड़े कॉल, मैसेज या ई-मेल को नजरअंदाज कर सकें। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह बिल फिलहाल कानून का रूप लेने से काफी दूर है।
यह बिल एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले ने लोकसभा में पेश किया है। चूंकि यह एक प्राइवेट मेंबर बिल है, इसलिए इसे सरकार के बजाय किसी सांसद ने पेश किया है। ऐसे बिल आमतौर पर किसी सामाजिक या नीतिगत मुद्दे पर चर्चा शुरू करने के लिए लाए जाते हैं और इनके कानून बनने की संभावना कम रहती है। बिल का मूल मकसद कर्मचारियों को काम के बाद ‘डिसकनेक्ट’ होने का अधिकार देकर उनकी मानसिक सेहत और वर्क-लाइफ बैलेंस को बेहतर बनाना है।
कॉरपोरेट जगत की प्रतिक्रिया की बात करें तो कई बड़ी कंपनियों और प्रोफेशनल फर्मों ने इस विचार का समर्थन किया है। मर्सिडीज-बेंज इंडिया, आरपीजी ग्रुप, वाडिया समर्थित बॉम्बे रियल्टी, ग्रांट थॉर्नटन इंडिया, टीम-लीज सर्विसेज और रैंडस्टैड जैसी कंपनियों के अधिकारियों का कहना है कि इस तरह के प्रावधान काम और निजी जीवन के बीच स्पष्ट सीमा तय करते हैं, जिससे कर्मचारियों की भलाई और उत्पादकता दोनों बढ़ती हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक फ्रांस, बेल्जियम, आयरलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पहले से ही ‘राइट टू डिसकनेक्ट’ से जुड़े कानून लागू हैं। आरपीजी ग्रुप के एक प्रवक्ता ने कहा कि इस बिल की सोच कंपनी की मौजूदा नीतियों से मेल खाती है। ग्रुप में पहले से फ्लेक्सिबल वर्किंग आवर्स और हाइब्रिड वर्क मॉडल लागू है। उदाहरण के तौर पर, आरपीजी ग्रुप की कंपनी सीईएटी में रात 8 बजे से सुबह 8 बजे तक ‘नो-वर्क पॉलिसी’, साइलेंट लंच आवर्स और वीकेंड पर काम न करने जैसे नियम हैं।
मर्सिडीज-बेंज इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ संतोष अय्यर ने कहा कि कंपनी वर्क-लाइफ बैलेंस को प्राथमिकता देती है और हाइब्रिड वर्क मॉडल अपनाती है, जिसमें कर्मचारी सप्ताह में दो दिन घर से काम करते हैं। उनके अनुसार, इस मॉडल से कर्मचारियों को परिवार के साथ समय बिताने, यात्रा का समय बचाने और अपनी जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से निभाने में मदद मिलती है।
रैंडस्टैड इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ विश्वनाथ पीएस ने इस बिल को भारतीय वर्कफोर्स के लिए ‘परिपक्वता का संकेत’ बताया। उनका कहना है कि यह ‘हमेशा उपलब्ध रहने’ की संस्कृति से बाहर निकलने की दिशा में एक अहम कदम है और इससे नेतृत्व को काम के घंटों की बजाय काम के नतीजों पर ध्यान देने के लिए प्रेरणा मिलेगी।
ग्रांट थॉर्नटन इंडिया की पार्टनर प्रियंका गुलाटी के मुताबिक, यह विचार कई कॉरपोरेट संगठनों में समर्थन पा रहा है। उन्होंने कहा कि परिपक्व संगठनों में सेल्फ-अकाउंटबिलिटी ज्यादा प्रभावी होती है, जहां कर्मचारी अपने काम की गुणवत्ता और ऊर्जा को समझते हैं और सीमाएं तय करने में खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि बिजनेस जरूरत पड़ने पर कर्मचारियों में अतिरिक्त प्रयास करने की क्षमता भी होनी चाहिए।
टीम-लीज डिजिटल की सीईओ नीति शर्मा ने कहा कि उनकी कंपनी में सोमवार से शुक्रवार सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक का वर्किंग शेड्यूल है, जिसमें जरूरी फ्लेक्सिबिलिटी दी जाती है। उनका मानना है कि तय काम के घंटे एक आधार तय करते हैं, लेकिन ग्लोबल टीमों, टाइम जोन और प्रोजेक्ट आधारित काम को देखते हुए लचीलापन भी जरूरी है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि खासतौर पर युवा प्रोफेशनल्स के लिए काम और निजी जीवन की स्पष्ट सीमाएं बेहद जरूरी हैं, क्योंकि वे अक्सर ‘ना’ कहने में हिचकिचाते हैं। बॉम्बे रियल्टी की ग्रुप चीफ एचआर ऑफिसर लिडिया नाइक के अनुसार, कोई एक मॉडल सभी पर लागू नहीं हो सकता। असल मायने काम की गुणवत्ता, संतुलन और यथार्थवादी वर्कलोड का है, न कि केवल काम के घंटे।
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