द देवरिया न्यूज़/नई दिल्ली: “दिल ना-उम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है…” फैज अहमद फैज का यह शेर इस वक़्त प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी ‘जनसुराज’ की स्थिति पर पूरी तरह फिट बैठता है। बिहार विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार ने न सिर्फ पीके को गहरा झटका दिया, बल्कि उनकी राजनीतिक यात्रा को भी बड़ा सवाल दे दिया है। हालांकि, हार के बाद भी प्रशांत किशोर मैदान छोड़ने के मूड में नहीं हैं। बल्कि वे पहले से ज्यादा आक्रामक रणनीति के साथ फिर से बिहार की धरती पर उतरने की तैयारी में हैं।
हार की उम्मीद नहीं थी, लेकिन तैयार थे पीके
जनसुराज से जुड़े सूत्र बताते हैं कि प्रशांत किशोर को इस बात की कल्पना नहीं थी कि उनकी पार्टी का प्रदर्शन इतना कमजोर रहेगा। उन्हें भरोसा था कि उनकी तीन साल लंबी पदयात्रा का प्रभाव वोट में दिखेगा और जनसुराज कुछ सीटों पर चौंकाने वाले नतीजे देगी। लेकिन परिणाम उम्मीद के ठीक उलट रहे। बावजूद इसके, पीके मानसिक रूप से इस स्थिति के लिए तैयार थे और नतीजों वाले दिन ही उन्होंने आगे की रणनीति का संकेत दे दिया था।
राजनीति नहीं छोड़ेंगे प्रशांत किशोर
अटकलों के विपरीत प्रशांत किशोर राजनीति छोड़ने नहीं जा रहे। न ही वे किसी दूसरे क्षेत्र में करियर तलाश रहे हैं। इसके बजाय, वे पहले की तरह बिहार के लोगों के बीच जाने का प्लान बना चुके हैं। सूत्रों के अनुसार पीके 1 दिसंबर के आसपास फिर से अपनी पदयात्रा शुरू करेंगे। पिछले दौर में उनका दक्षिण बिहार हिस्सा छूट गया था, इसलिए अब वे इस क्षेत्र में गहराई से अभियान चलाने की तैयारी कर रहे हैं।
किन जिलों में होगी अगली पदयात्रा
नई पदयात्रा मुख्य रूप से दक्षिण और मध्य बिहार के 14 जिलों में होगी—
पटना, गया, बक्सर, भोजपुर, कैमूर, नालंदा, अरवल, जहानाबाद, शेखपुरा, बांका, बेगूसराय और खगड़िया जैसे जिले इसमें शामिल हैं।
मुद्दे वही, लेकिन तरीका बदलेगा
सूत्रों के मुताबिक पीके अपने पुरानों मुद्दों—पलायन, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्कूलों और अस्पतालों की दुर्दशा—पर ही फोकस करेंगे। हालांकि इस बार वे तरीका बदलने वाले हैं। वे कुछ दिनों तक नई सरकार के फैसलों और कामकाज पर नज़र रखेंगे और फिर जनता को बताएंगे कि एनडीए ने चुनाव के दौरान किए वादों को पूरा किया या नहीं।
पीके खास तौर पर यह समझाने की योजना में हैं कि बिहार की जनता ने ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ जैसे कार्यक्रमों के प्रभाव में वोट तो दे दिया, लेकिन अब क्या उन्हें वास्तविक विकास और मूलभूत सुविधाएं मिल पाएंगी—यह महत्वपूर्ण सवाल सामने है।
तीन साल की पदयात्रा का असर और आंकड़े
प्रशांत किशोर ने 2 अक्टूबर 2022 को पदयात्रा की शुरुआत की थी। तीन वर्षों में उन्होंने लगभग पूरे बिहार का दौरा किया, समस्याएं सुनीं और जमीनी मुद्दे उठाए।
चुनाव में जनसुराज का प्रदर्शन इस प्रकार रहा—
35 सीटों पर पार्टी को ऐसे वोट मिले जो जीत के अंतर से अधिक थे
इन 35 सीटों में 19 सीटें NDA, 15 सीटें महागठबंधन, 1-1 सीट AIMIM और BSP ने जीती
115 सीटों पर जनसुराज प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहे
एक सीट पर पार्टी दूसरे नंबर पर रही
238 में से 236 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई
आगे की राह
विश्लेषकों के अनुसार, अगर पीके दक्षिण बिहार में मजबूत नेटवर्क बनाने में सफल होते हैं और जमीनी मुद्दों को फिर से उठाते हैं, तो आने वाले समय में जनसुराज को पुनर्जीवित करने की संभावनाएं बनी रह सकती हैं।
फिलहाल साफ है कि प्रशांत किशोर हार से टूटे नहीं हैं। बल्कि उसी हार को ऊर्जा में बदलते हुए एक बार फिर बिहार की राजनीतिक जमीन पर उतरने को तैयार हैं—और इस बार रणनीति पहले से ज्यादा तेज, केंद्रित और साफ दिख रही है।
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