कथा के अनुसार, वृंदावन में एक संत निवास करते थे, जिन्हें लोग पहले एक प्रतिष्ठित और न्यायप्रिय जज के रूप में जानते थे। उनका जीवन वैभव, सम्मान और ऊंचे पद से भरा हुआ था, लेकिन एक साधारण सी घटना ने उनकी पूरी जीवन दिशा बदल दी।
बताया जाता है कि एक बार यात्रा के दौरान उन्हें नदी पार करनी थी। वहां एक साधारण केवट (नाविक) ने उन्हें अपनी नाव से पार कराया। यात्रा के दौरान हुई बातचीत में केवट की सरलता, ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास और सच्ची भक्ति ने जज के हृदय को गहराई से छू लिया। केवट ने बड़ी सहजता से समझाया कि संसार के पद, प्रतिष्ठा और वैभव क्षणभंगुर हैं, जबकि भगवान की भक्ति ही सच्चा आनंद और शांति देती है।
यह बात जज के मन में घर कर गई। उस निष्कपट भक्ति और सच्चे ज्ञान ने उनके अंतर्मन को झकझोर दिया। परिणामस्वरूप उन्होंने अपने उच्च पद, ऐश्वर्य और सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया और वृंदावन में जाकर साधु जीवन अपना लिया। उनका यह परिवर्तन भक्ति की शक्ति और आत्मिक जागृति का अद्भुत उदाहरण बन गया।
‘भक्त माल’ की यह कथा यह संदेश देती है कि सच्चा ज्ञान और ईश्वर की अनुभूति किसी भी व्यक्ति से मिल सकती है, चाहे वह कितना ही साधारण क्यों न हो। भक्ति के मार्ग में न तो पद का महत्व है और न ही धन का, बल्कि जरूरी है सच्ची श्रद्धा और समर्पण।
महायज्ञ के दौरान इस कथा ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित किया और यह संदेश दिया कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य भौतिक सुख नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और ईश्वर की भक्ति है।
इस अवसर पर अध्यक्ष गुलाब सिंह, राजेंद्र सिंह, सुजीत प्रताप सिंह, ग्राम प्रधान अजीत सिंह, अजय सिंह, अंगद नाथ तिवारी, हरेंद्र सिंह, दरोगा सिंह, प्रमोद चौबे, बृजेश शुक्ला, कैलाश सिंह और जिक्रूलाह सिद्दीकी सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम में भक्तों का उत्साह और आस्था देखते ही बन रही थी।