मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सतुआ बाबा शोभाराम तिवारी और राजा बेटी तिवारी के चार बच्चों में सबसे छोटे हैं। पारंपरिक पढ़ाई में मन न लगने पर उन्होंने आध्यात्मिक शिक्षा की ओर रुख किया। उनके बड़े भाई महेश तिवारी उन्हें वाराणसी के मणिकर्णिका घाट ले गए, जहां मुख्य पुजारी यमुनाचार्य महाराज के मार्गदर्शन में उन्हें विष्णुस्वामी संप्रदाय, जिसे सतुआ आश्रम भी कहा जाता है, में प्रवेश दिलाया गया। यहां वे धार्मिक अध्ययन में पूरी तरह रम गए और जल्द ही गुरु के प्रिय शिष्य बन गए।
करीब 2005 में संतोष दास ने औपचारिक रूप से संन्यास ग्रहण किया। गुरु यमुनाचार्य महाराज ने अपने जीवनकाल में ही उन्हें महामंडलेश्वर और उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। 2011 में गुरु के निधन के बाद उन्होंने संप्रदाय की कमान संभाली और 2012 में विष्णुस्वामी संप्रदाय के 57वें आचार्य बने। इसी दौरान उन्हें ‘सतुआ बाबा’ की उपाधि मिली। बताया जाता है कि आश्रम के कठिन दौर में संतों द्वारा सत्तू का सेवन किए जाने की परंपरा के चलते यह नाम प्रचलित हुआ।
हाल के दिनों में सतुआ बाबा चर्चा में तब आए, जब माघ मेले के दौरान उनकी लग्जरी कारों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं। शिविर के बाहर खड़ी पोर्श 911 टर्बो और लैंड रोवर डिफेंडर जैसी महंगी गाड़ियों, ब्रांडेड धूप के चश्मे और विशिष्ट मेहमानों की मौजूदगी ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया। इस पर जहां कुछ लोगों ने आलोचना की, वहीं समर्थकों ने इसे उनकी लोकप्रियता से जोड़ा।
सतुआ बाबा को काशी विश्वनाथ का प्रतिनिधि भी कहा जाता है। महाकुंभ 2025 के दौरान उन्हें जगद्गुरु की उपाधि दी गई थी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी सनातन धर्म और आध्यात्मिक एकता को बढ़ावा देने के लिए उनकी सराहना की है। माघ मेले में उनके आश्रम के लिए सबसे अधिक भूमि आवंटन भी चर्चा का विषय रहा।
बताया जाता है कि सतुआ पीठ के पास उत्तर प्रदेश और गुजरात सहित कई राज्यों में संपत्तियां हैं। केवल बनारस स्थित आश्रम की कीमत लगभग 50 करोड़ रुपये आंकी जाती है। हालांकि सतुआ बाबा का कहना है कि ये सभी संपत्तियां धार्मिक उद्देश्यों के लिए हैं। उनकी कुल संपत्ति को लेकर आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन विभिन्न रिपोर्ट्स में उनकी नेटवर्थ 15 से 30 करोड़ रुपये या उससे अधिक बताई जा रही है।