द देवरिया न्यूज़ : देवरिया के तवक्कलपुर गांव में शुक्रवार की सुबह ऐसा दर्द लेकर आई, जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी। गांव की गलियों में सन्नाटा था, चूल्हे नहीं जले, हर घर में रोने की आवाज गूंज रही थी। पंचायत भवन के पीछे एक संकरी गली में चार शव साथ रखे थे—चारों के परिवार चीखते, बिलखते बस एक ही बात दोहरा रहे थे—“चारों दोस्त साथ गए, और मौत भी साथ ही आई।”
सबसे दर्दनाक दृश्य था राहुल सिंह की मां नर्बदा और उसकी बहन अमृता का। मां का दिल दहाड़ मारकर रोते हुए बस एक ही सवाल पूछ रहा था—
“हे भगवान मेरे लाल को लौटा दो… अब मेरा घर कौन संभालेगा? किसे राखी बांधूँ? वो कहता था विदेश से गिफ्ट लाएगा… बड़े घर में सब साथ रहेंगे… अब कौन करेगा?”
अमृता की हालत बार-बार बिगड़ती जा रही थी। बेहोशी और चीखों के बीच वह सिर्फ भाई का नाम पुकार रही थी। पूरा गांव स्तब्ध था, हर आंख नम थी।
कैसे हुई चारों की मौत
गुरुवार रात कानपुर के पनकी इंडस्ट्रियल एरिया में अमित वर्मा (32), संजू सिंह (26), राहुल सिंह (23) और दाऊद अंसारी (28) ने एक छोटे से कमरे में पार्टी की। चिकन, रोटी-चावल खाकर ठंड से बचने के लिए कमरे में तसले में कोयला जलाया और दरवाज़ा बंद कर सो गए।
सुबह जब काफी देर तक दरवाजा नहीं खुला, तो साथियों ने तोड़कर देखा—चारों की सांसें थम चुकी थीं।
प्रारंभिक जांच में कोयले के धुएं से दम घुटने के कारण मौत की पुष्टि हुई।
सुबह 9 बजे जब दो एंबुलेंस में चारों की बॉडियां गांव पहुंचीं, चीख-पुकार से गांव का माहौल फट पड़ा। हजारों लोग अंतिम दर्शन के लिए टूट पड़े।
तीन की चिताएं साथ जलीं, एक का जनाज़ा
राजघाट श्मशान घाट पर 8-8 मीटर के अंतर पर तीन चिताएं सजाई गईं—राहुल, अमित और संजू की।
दाऊद अंसारी का जनाज़ा गांव के कब्रिस्तान में नम आंखों के बीच सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
राहुल को पिता लल्लन ने मुखाग्नि दी
अमित को उसके भाई अरुण ने
संजू को उसके भाई अनिल ने
हर किसी के दिल में एक ही टीस—चारों दोस्त हमेशा साथ रहे, मरने के बाद भी साथ ही विदा हुए।
चार परिवार, चार बिखरी दुनिया
1️⃣ दाऊद अंसारी (28) — परिवार का इकलौता कमाने वाला
दाऊद की दो साल की बेटी आयत अभी समझ भी नहीं पा रही कि उसकी दुनिया लूट चुकी। पत्नी शकीना बेसुध—
“अब हम कैसे जिएंगे… आयत को कौन संभालेगा?”
2️⃣ राहुल सिंह (23) — दुबई जाने वाला एकमात्र बेटा
पासपोर्ट बन चुका था, वीज़ा भी आ गया था। शुक्रवार को गांव लौटकर विदेश जाने की तैयारी करनी थी। सपना था परिवार को बड़ा घर दिलाना।
अब मां की चीखें दीवारों से टकराती रहीं—
“मेरा बेटा विदेश जाने वाला था… ये कहां चला गया?”
3️⃣ संजू सिंह (26) — परिवार की उम्मीद
गरीबी में पला, घर संभालने कानपुर कमाने गया था। छोटे भाई सूरज की टूटी आवाज—
“भइया ओढ़नी लेके आवत कहिन… लेकिन उ फिर ना लौटेन…”
4️⃣ अमित बरनवाल (32) — आर्थिक सहारा
घर खर्च वही चलाता था। 20 नवंबर की रात उसे जिम्बाब्वे के लिए उड़ान भरनी थी। राहुल के साथ विदेश में नौकरी तय थी। भाइयों ने फफकते हुए कहा—
“वो हमारी ताकत था… अब घर कैसे चलेगा?”
एक हादसा, चार जनाजे, पूरा गांव टूटा
तवक्कलपुर ने एक साथ चार युवा बेटे खो दिए। किसी की मां टूट गई, किसी की पत्नी, किसी की बहन, किसी की बेटी… इन चार घरों की चीखें पूरे जिले में एक सवाल छोड़ गईं—
“ज़िंदगी की छोटी गलतियाँ कभी-कभी पूरी दुनिया उजाड़ देती हैं।”
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