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बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया का निधन, ‘बैटल ऑफ द बेगम्स’ का अध्याय समाप्त

Published on: December 31, 2025
Former Prime Minister of Bangladesh Begum

द देवरिया न्यूज़,ढाका/नई दिल्ली: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की प्रमुख बेगम खालिदा जिया का 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया। ढाका स्थित एवरकेयर अस्पताल में इलाज के दौरान स्थानीय समयानुसार सुबह करीब 6 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ ही बांग्लादेश की राजनीति में दशकों से चली आ रही ‘दो बेगमों की लड़ाई’ का एक युग समाप्त हो गया।

पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने खालिदा जिया के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि “बांग्लादेश की राजनीति में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा है।” शेख हसीना स्वयं पिछले वर्ष अगस्त से भारत में रह रही हैं।

तीन बार प्रधानमंत्री रहीं खालिदा जिया

बेगम खालिदा जिया तीन बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहीं। वर्ष 2018 में शेख हसीना सरकार के दौरान भ्रष्टाचार के मामलों में उन्हें जेल भेजा गया था। उनकी पार्टी लगातार यह मांग करती रही कि खराब स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें विदेश में इलाज की अनुमति दी जाए, लेकिन इसकी इजाजत नहीं दी गई।

‘बैटल ऑफ द बेगम्स’ का अंत

शेख हसीना और बेगम खालिदा जिया के बीच दशकों चली राजनीतिक प्रतिद्वंदिता को बांग्लादेश में ‘बैटल ऑफ द बेगम्स’ कहा जाता था। यह टकराव सिर्फ सत्ता संघर्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें जेल, मुकदमे, राजनीतिक बदले और संस्थाओं के दुरुपयोग जैसे आरोप भी शामिल रहे।

प्रतिद्वंदिता की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

इस राजनीतिक संघर्ष की जड़ें बांग्लादेश के आजादी के बाद के उथल-पुथल भरे दौर में हैं। शेख हसीना, बांग्लादेश के संस्थापक और पहले राष्ट्रपति शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हैं। 1975 में एक सैन्य तख्तापलट के दौरान शेख मुजीबुर रहमान और उनके परिवार के अधिकांश सदस्यों की हत्या कर दी गई थी।

इसके बाद सैन्य शासन के पतन के बाद सत्ता खालिदा जिया के पति जियाउर रहमान के हाथों में आई, लेकिन 1981 में एक नाकाम सैन्य तख्तापलट के दौरान उनकी भी हत्या कर दी गई। इसके बाद खालिदा जिया ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की कमान संभाली और यहीं से दोनों नेताओं के बीच प्रतिद्वंदिता की शुरुआत हुई।

लोकतंत्र पर पड़ा गहरा असर

1990 और 2000 के दशक में सत्ता बार-बार दोनों नेताओं के बीच बदलती रही। हर चुनाव के साथ राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ता गया। संसद का बहिष्कार, हड़तालें, सड़क हिंसा और संस्थानों के राजनीतिक इस्तेमाल ने देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर किया और बांग्लादेश लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता से जूझता रहा।

तानाशाही के खिलाफ एकजुटता भी रही

हालांकि, 1980 के दशक के अंत में दोनों बेगमों ने सैन्य शासक हुसैन मोहम्मद इरशाद के खिलाफ एकजुट होकर आंदोलन किया। 1990 में छात्र आंदोलनों के नेतृत्व में हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद इरशाद को 6 दिसंबर 1990 को इस्तीफा देना पड़ा। यह बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास का एक अहम मोड़ था।

एक युग का अंत

इरशाद के पतन के बाद दोनों नेताओं के बीच फिर से टकराव और बदले की राजनीति शुरू हुई, जो दशकों तक चलती रही। पिछले वर्ष शेख हसीना की सत्ता से विदाई और अब बेगम खालिदा जिया के निधन के साथ बांग्लादेश की राजनीति का यह ऐतिहासिक अध्याय पूरी तरह समाप्त हो गया है।


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