मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस उज्जवल भुइयां की पीठ ने कहा कि उचित मुआवजा देना संविधान द्वारा सुनिश्चित अधिकार है, जिसे किसी भी स्थिति में कमजोर नहीं किया जा सकता। अदालत ने साफ किया कि वित्तीय दबाव का हवाला देकर प्रभावित भूमि मालिकों के अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता।
यह मामला 2019 के एक महत्वपूर्ण फैसले से जुड़ा है, जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए भूमि अधिग्रहण पर दिया जाने वाला मुआवजा और ब्याज केवल भविष्य के मामलों में लागू होगा। हालांकि, 4 फरवरी 2025 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को पूर्वव्यापी (रेट्रोस्पेक्टिव) प्रभाव से लागू करने का आदेश दिया था, जिससे पहले से अधिग्रहित जमीनों के मालिकों को भी इसका लाभ मिल सके।
NHAI ने इसी फैसले को चुनौती देते हुए पुनर्विचार याचिका दायर की थी। प्राधिकरण का तर्क था कि इस फैसले से उस पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा। पहले यह आंकड़ा लगभग 100 करोड़ रुपये बताया गया था, लेकिन बाद में इसे बढ़ाकर करीब 29,000 करोड़ रुपये बताया गया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अपने आदेश में अदालत ने कहा कि भले ही संशोधित वित्तीय आंकड़े को रिकॉर्ड में लिया जाए, लेकिन यह पहले दिए गए फैसले के मूल सिद्धांतों पर पुनर्विचार करने का आधार नहीं बन सकता।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि भूमि अधिग्रहण के मामलों में ब्याज की दर भूमि अधिग्रहण अधिनियम के अनुसार 9 प्रतिशत होगी, न कि NHAI अधिनियम के तहत तय 5 प्रतिशत की सीमा के अनुसार। यह फैसला सीधे तौर पर उन किसानों के हित में माना जा रहा है, जिनकी जमीन राष्ट्रीय परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में दो टूक कहा कि “वित्तीय बोझ मुआवजे से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता।” इस फैसले से यह संदेश गया है कि विकास परियोजनाओं के नाम पर भूमि मालिकों के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय देशभर में भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामलों पर दूरगामी प्रभाव डालेगा और प्रभावित किसानों को न्याय दिलाने की दिशा में एक मजबूत कदम साबित होगा।