द देवरिया न्यूज़/लखनऊ: बिहार विधानसभा चुनाव में जहां एनडीए गठबंधन बहुमत हासिल करके सरकार बनाने की ओर बढ़ रहा है, वहीं बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने अपने अप्रत्याशित प्रदर्शन से राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। बसपा ने बिहार में एक सीट जीतकर कई दिग्गज दलों को चौंका दिया है। खास बात यह है कि पार्टी प्रदेश में कहीं भी प्रमुख मुकाबले में नहीं मानी जा रही थी और न ही बसपा सुप्रीमो मायावती ने वहां अपना खास चुनावी ज़ोर लगाया था। अब इस प्रदर्शन के बाद यूपी चुनाव 2027 के मद्देनजर मायावती का बढ़ता प्रभाव बीजेपी और सपा दोनों के लिए चुनौती बन सकता है।
AIMIM के साथ बढ़ती नजदीकियों पर सियासी हलचल
चुनाव के दौरान सामने आए कई संकेतों ने बहुजन समाज पार्टी और असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM के बीच बढ़ती नजदीकियों की ओर इशारा किया है। बसपा नेता अनिल पटेल और विजेता उम्मीदवार पिंटू यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस में AIMIM का झंडा दिखाई देना, या जीत के जुलूस में AIMIM के समर्थकों की मौजूदगी—ये सभी घटनाएं यह बताने के लिए काफी हैं कि दोनों पार्टियों के बीच अंदरखाने बातचीत हो रही है।
सूत्र बताते हैं कि AIMIM नेताओं ने उन सीटों पर भी बसपा को वोट देने की अपील की, जहां AIMIM के उम्मीदवार मैदान में नहीं थे। जबकि चुनाव में AIMIM का गठबंधन चंद्रशेखर आज़ाद और स्वामी प्रसाद मौर्य की पार्टी से था, फिर भी ओवैसी ने पूरे चुनाव अभियान में चंद्रशेखर के साथ मंच साझा नहीं किया। इसने सियासी गलियारों में सवाल और भी गहरे कर दिए हैं।
ओवैसी–मायावती की संभावित रणनीति पर विशेषज्ञों की नजर
वरिष्ठ पत्रकार सैयद कासिम का कहना है कि मायावती संकेतों की राजनीति करती हैं। अगर AIMIM से दूरी बनानी होती तो वह मंच से ही संदेश दे देतीं। लेकिन चुप्पी और AIMIM नेताओं के सकारात्मक बयानों ने इस संभावना को मजबूत किया है कि आने वाले महीनों—खासतौर पर मार्च–अप्रैल तक—दोनों पार्टियों के बीच कोई बड़ा राजनीतिक समीकरण बन सकता है।
कासिम ने AIMIM प्रवक्ता असीम वकार के उस बयान का भी उल्लेख किया जिसमें उन्होंने मायावती को प्रधानमंत्री बनाने की बात कही थी। इसी तरह से अक्टूबर में ओवैसी की मुस्लिम समुदाय के साथ हुई बैठक के बाद यह नजदीकियां और बढ़ी मानी जा रही हैं।
BSP–AIMIM गठजोड़ क्या बदल सकता है?
BSP और AIMIM का इतिहास भी बताता है कि दोनों पहले भी तालमेल कर चुके हैं। 2020 के बिहार चुनाव में दोनों ने गठबंधन में चुनाव लड़ा था। विशेषज्ञों का मानना है कि मायावती मुस्लिम वोट बैंक को साधने के लिए AIMIM के साथ जा सकती हैं, जबकि ओवैसी अपने कट्टरपंथी छवि को संतुलित करने के लिए BSP जैसे दल का सहारा ले सकते हैं।
बिहार में AIMIM की सफलता और UP में संभावित असर
इस चुनाव में AIMIM को 5 सीटों पर जीत मिली है जबकि 10 सीटें बेहद कम अंतर से हार गई। इससे साफ है कि ओवैसी की स्वीकार्यता बढ़ी है और मुस्लिम वोट उनके प्रति झुक रहा है। यदि BSP और AIMIM एक साथ आते हैं, तो विशेषज्ञों के अनुसार इसका सबसे बड़ा असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में देखने को मिल सकता है। शाहजहांपुर से सहारनपुर तक लगभग 100 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां यादव वोट नगण्य है, जबकि जाटव और मुस्लिम आबादी मिलकर 55–60% वोट बना देती है। इस गणित में BSP–AIMIM गठजोड़ कई सीटों पर परिणाम बदल सकता है।
2027 के लिए नया राजनीतिक खेल?
विश्लेषकों का दावा है कि BSP जब भी मजबूती से चुनाव लड़ती है तो उसका सीधा असर बीजेपी की सीटों पर पड़ता है। वहीं सपा प्रमुख अखिलेश यादव, बिहार नतीजों के बाद कांग्रेस पर दबाव बढ़ाने की कोशिश करेंगे, लेकिन कांग्रेस उनके दबाव में आने को तैयार नहीं दिखती। ऐसे में मायावती का “मुस्लिम कार्ड” और ओवैसी के साथ संभावित गठबंधन 2027 के यूपी चुनाव में बड़ा खेल साबित हो सकता है।
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