द देवरिया न्यूज़, नई दिल्ली: कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर हेरफेर के गंभीर आरोपों के बाद देश की राजनीति में नई हलचल मच गई है। गांधी ने दावा किया है कि बिहार चुनावों से पहले ही मतदाता सूचियों में भारी अनियमितताएँ सामने आईं, जबकि हरियाणा विधानसभा चुनाव में “25 लाख वोट चुराए जाने” का आरोप उन्होंने दोहराया है। उनके अनुसार फर्जी, हटाए गए और डुप्लिकेट वोटों के चलते सत्ताधारी दल को सीधा फायदा मिला।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत का दृष्टिकोण
इन आरोपों पर टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ओ.पी. रावत ने कहा कि आज के चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया पूर्व परंपराओं से अलग दिखाई दे रही है। रावत, जिन्होंने 2015–2018 तक चुनाव आयुक्त और बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्य किया, कहते हैं कि “संतुष्टि का प्रश्न ही नहीं है, क्योंकि हम अब बाहर के लोग हैं, लेकिन आयोग पहले हर शिकायत को तत्काल, गंभीरता से और सभी राजनीतिक दलों की भागीदारी के साथ जांचता था।”
रावत के अनुसार, पहले हर शिकायत पर एक खुली और पारदर्शी प्रक्रिया चलती थी—राजनीतिक दलों को जांच टीमों में शामिल किया जाता था, घर-घर जाकर तथ्यों की जांच होती थी और रिपोर्ट सार्वजनिक डोमेन में रखी जाती थी। लेकिन उन्होंने संकेत दिया कि “पिछले कुछ महीनों में आयोग इस स्थापित प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहा है।”
हरियाणा की मतदाता सूची में 200 बार दर्ज महिला की एंट्री पर प्रतिक्रिया
राहुल गांधी द्वारा दिखाए गए उदाहरण—जहाँ एक महिला का नाम 200 बार दर्ज है—पर रावत ने कहा कि यह चुनाव आयोग के लिए “बहुत शर्मनाक” स्थिति है, क्योंकि ऐसे मामलों से आम मतदाता का चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा कमजोर होता है।
उन्होंने यह भी माना कि हरियाणा की वोटिंग लिस्ट में एक ब्राजीलियाई महिला की तस्वीर 22 नामों के साथ पाई जाना गंभीर त्रुटि है। रावत कहते हैं, “ऐसे मामलों को नजरअंदाज करना उचित नहीं, क्योंकि इससे जनता के मन में शंकाएँ पैदा होती हैं।”
क्या बड़े पैमाने पर त्रुटियाँ आम हैं?
पूर्व CEC कहते हैं कि मतदाता सूची अपडेट करने का काम 100% सरकारी मशीनरी के नियंत्रण में नहीं होता, कई बार आउटसोर्स एजेंसियाँ शामिल होती हैं, जिससे त्रुटियाँ हो जाती हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल का एक पुराना मामला याद करते हुए कहा कि हैदराबाद में भी एक शिकायत आई थी, जिसमें दर्जनों एंट्री में एक जैसी तस्वीरें मिली थीं। “हमने उसी दिन वार्ड-वार जांच टीम बनाई और सभी दलों के प्रतिनिधियों को शामिल किया। अगले ही दिन घर-घर जाकर जांच पूरी कर ली गई और रिपोर्ट सार्वजनिक कर दी।”
क्या डुप्लिकेट एंट्री से वोट भी डाले जा सकते हैं?
रावत के अनुसार, “नाम का 200 बार दिखना एक बात है, लेकिन उन 200 वोटों का डाला जाना दूसरी।” उन्होंने जोर देकर कहा कि मतदान प्रक्रिया में कई स्तरों के चेक और बैलेंस हैं—पोलिंग एजेंट, रैंडमाइज्ड पोलिंग पार्टियां, पहचान सत्यापन—जिससे प्रतिरूपण आसान नहीं होता।
क्या राजनीतिक दल भी जिम्मेदार?
रावत का कहना है कि राजनीतिक दल अक्सर स्वयं भी मतदाता सूची सुधार प्रक्रिया में रुचि नहीं लेते। “अगर उन्हें फॉर्म भरने, सत्यापन में शामिल होने की अनुमति दी जाए, तो वे भी लड़ाई का मैदान अपने अनुकूल करने की कोशिश करेंगे।”
नाम हटाने के आरोप कितने गंभीर?
पूर्व CEC ने कहा कि मृत और स्थानांतरित मतदाताओं को हटाना जरूरी है, लेकिन किसी भी जीवित योग्य मतदाता का नाम हटना गंभीर समस्या है। बड़े पैमाने पर संशोधन के दौरान नोटिस व्यक्तिगत रूप से नहीं भेजे जाते, इसलिए मतदाताओं को सतर्क रहना चाहिए।
क्या आरोप चुनाव परिणाम बदल सकते हैं?
इस सवाल पर रावत ने टिप्पणी करने से इनकार किया और कहा, “सर्वश्रेष्ठ तरीका है—जांच हो, तथ्य सार्वजनिक हों।”
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