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बिहार की कानून-व्यवस्था पर बहस तेज: क्या सम्राट चौधरी ‘ठोक दो’ वाली पुलिस से वापस ला पाएंगे ‘मंगलराज’? अभयानंद की कमी आज भी खल रही

Published on: December 1, 2025
On law and order of Bihar

द देवरिया न्यूज़,पटना: नवंबर 2005 के बाद बिहार में कानून का राज कैसे कायम हुआ था? अब पुलिस का वह इकबाल क्यों नहीं दिखाई देता? नीतीश कुमार वही हैं, फिर पहले जैसा प्रदर्शन क्यों नहीं दोहरा पा रहे? क्या सम्राट चौधरी की आक्रामक बयानबाज़ी से बिहार में फिर ‘मंगलराज’ लौट पाएगा? युद्ध कौशल की एक कहावत है—हथियार नहीं, उसके पीछे खड़ा व्यक्ति अधिक महत्वपूर्ण होता है। बिहार की कानून व्यवस्था भी इसी सिद्धांत पर खड़ी है। आज उसी ‘एक व्यक्ति’ की कमी सबसे ज्यादा महसूस की जा रही है—पूर्व डीजीपी अभयानंद की।

नीतीश और अभयानंद की पहली मुलाकात

नवंबर 2005 में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने सबसे ऊपर कानून-व्यवस्था को रखा। उस समय आईपीएस अभयानंद एडीजी मुख्यालय थे। ईमानदार और सख्त अफसर की पहचान रखने वाले अभयानंद को बुलाकर नीतीश ने पूछा—क्या जंगलराज खत्म हो सकता है? अभयानंद ने हां कहा, लेकिन साफ किया कि हर कदम कानून के दायरे में होगा और काम करने का तरीका उनकी सोच के मुताबिक चलेगा। उनके शब्द थे—“पुलिस का रूतबा और पुलिस की गुंडागर्दी में अंतर होता है, मैं कानून का रूतबा बहाल करूंगा।”

काम की पूरी आज़ादी—बेहतर नतीजे

नीतीश ने अभयानंद को बिना किसी दबाव के काम करने की खुली छूट दी। अभयानंद ने ‘ठोक दो’ मॉडल की जगह कानूनी हथियार अपनाए—स्पीडी ट्रायल और बेल कैंसिलेशन। थाना स्तर से लेकर एसपी तक सबको पता था कि कानून के रास्ते मजबूत सुनवाई होगी। पुलिस पुख्ता सबूत जुटाती, कोर्ट में तेजी से सुनवाई होती और अपराधियों को सजा मिलती।
साल 2010 में 14,311 अपराधी दोषी ठहराए गए, जिनमें 1,875 को उम्रकैद और 37 को मौत की सजा मिली। अपराधियों में खौफ बढ़ा, और नीतीश-भाजपा गठबंधन ने 2010 चुनाव में 206 सीटों की ऐतिहासिक जीत दर्ज की।

सुशासन के पीछे की सच्चाई

अभयानंद खुद मानते थे कि वे इसलिए काम कर पाए क्योंकि सत्ता और पुलिस का लक्ष्य एक था—कानून का राज। नीतीश हर बहस सुनते थे, मतभेदों पर बातचीत होती थी, जिससे बेहतर फैसले संभव हुए।

2014 के बाद सब कुछ बदलना शुरू

लोकसभा में करारी हार (40 में से सिर्फ 2 सीटें) ने नीतीश को हिला दिया। राजनीतिक समीकरण बदल गए। अभयानंद उस समय डीजीपी थे।
इसी दौरान मीसा भारती के खिलाफ दर्ज एक मामले को लेकर लालू यादव उनसे नाराज थे। 2014 के बाद सत्ता के तीन केंद्र बन गए—जीतन राम मांझी, नीतीश कुमार और लालू यादव।
अभयानंद जो पहले केवल नीतीश से निर्देश लेते थे, अब नए समीकरणों में घिर गए। मांझी को उनकी तार्किक ‘ना’ भी पसंद नहीं आई। अंततः उन्हें डीजीपी पद से हटा दिया गया। कहा जाता है लालू यादव ने भी इसमें भूमिका निभाई।
इसके बाद बिहार की कानून-व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौटने लगी।

क्या सम्राट चौधरी कर पाएंगे बदलाव?

सम्राट चौधरी गृहमंत्री जरूर हैं, लेकिन मुख्यमंत्री नहीं। उनके पास कोई अतिरिक्त शक्ति नहीं है कि वे अलग से पुलिस व्यवस्था बदल दें। वे नीतियां बना सकते हैं, निगरानी कर सकते हैं, लेकिन फील्ड में काम पुलिस को ही करना होगा।

अभयानंद के शब्दों में—
“स्वास्थ्य मंत्री संसाधन दे सकता है, नीतियां बना सकता है, लेकिन सर्जरी सर्जन ही करेगा। सर्जन जितना योग्य होगा, मरीज को उतना फायदा होगा।”

इसी तरह सम्राट चौधरी को भी कानून-व्यवस्था सुधारने के लिए किसी सक्षम ‘सर्जन’—यानी सक्षम आईपीएस नेतृत्व की जरूरत होगी।
जैसा कि 2005 में अभयानंद के रूप में बिहार को मिला था।


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