ईरान ने साफ किया है कि जो देश उसके खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई में शामिल नहीं हैं या उसका समर्थन नहीं कर रहे हैं, उनके जहाज तय सुरक्षा नियमों और समन्वय के साथ होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित गुजर सकते हैं।
भारत के लिए आसान हुआ रास्ता
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान से बातचीत में होर्मुज जलडमरूमध्य का मुद्दा उठाया था। इसके अलावा संसद में भी पीएम मोदी ने स्पष्ट कहा था कि “होर्मुज का बंद होना भारत के लिए स्वीकार्य नहीं है।”
फिलहाल इस क्षेत्र में करीब 20 भारतीय जहाज मौजूद हैं। हाल ही में दो भारतीय एलपीजी टैंकर सुरक्षित रूप से इस मार्ग से निकल चुके हैं, जिनमें करीब 60 भारतीय नाविक सवार थे।
वैश्विक दबाव का असर
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के इस रुख में बदलाव के पीछे बढ़ता अंतरराष्ट्रीय दबाव एक बड़ा कारण है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का एक प्रमुख मार्ग है और इसके बंद होने से पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट गहरा सकता है। अमेरिका भी इस मुद्दे पर दबाव में है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हाल में दिखाई गई नरमी के पीछे भी यह रणनीतिक कारण हो सकता है।
खाड़ी देशों का भी दबाव
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों की सख्ती ने भी ईरान को अपने रुख में नरमी लाने पर मजबूर किया है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि ये देश ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में शामिल हो सकते हैं।
भारतीय जहाजों की आवाजाही शुरू
पश्चिम एशिया संकट के शुरुआती दिनों में भारतीय जहाजों की आवाजाही पूरी तरह ठप हो गई थी। लेकिन हालिया कूटनीतिक प्रयासों के बाद अब स्थिति में सुधार दिख रहा है।
अब तक ‘शिवालिक’, ‘नंदा देवी’, ‘पाइन गैस’ और ‘जग वसंत’ जैसे भारतीय जहाज होर्मुज से गुजर चुके हैं। वहीं ‘जग लाडकी’ नामक तेल टैंकर सुरक्षित भारत पहुंच चुका है। फिलहाल, ईरान के इस संकेत को क्षेत्र में तनाव कम करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है, हालांकि स्थिति अभी भी संवेदनशील बनी हुई है।