द देवरिया न्यूज़/अलीगढ़: उत्तर भारत में रहने वालों को इस बार कड़ाके की ठंड पहले से ज्यादा झेलनी पड़ सकती है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इस साल सर्दी समय से पहले दस्तक दे चुकी है और यह देर तक रहने वाली है। इस बदलाव के पीछे कारण है मौसम का वह चक्र, जिसे ला नीना (La Niña) कहा जाता है—यह हर 4–5 साल में एक बार सक्रिय होता है और तापमान में भारी गिरावट लाता है।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के भूगोल विभाग के मौसम विशेषज्ञ प्रोफेसर अतीक अहमद ने बताया कि इस बार जनवरी और फरवरी में कड़ाके की ठिठुरन और शीतलहर की संभावना काफी अधिक है।
उन्होंने बताया कि ला नीना के दौरान धरती पर पूर्व से पश्चिम दिशा में हवाएं तेज चलती हैं और समुद्री जल में दोलन की प्रक्रिया शुरू होती है। इससे वातावरण में कूलिंग इफेक्ट पैदा होता है, जिसका सीधा असर उत्तर और मैदानी इलाकों पर पड़ता है।
पिछली बार ला नीना का असर 2021 में देखा गया था, और मौजूदा अध्ययन के संकेत बताते हैं कि इस बार प्रभाव और ज्यादा घातक हो सकता है। प्रोफेसर अतीक अहमद इस पैटर्न पर लगातार रिसर्च कर रहे हैं और सरकार व किसानों को पहले से चेतावनी देकर नुकसान कम करने में मदद करते हैं।
किसानों के लिए सबसे बड़ा खतरा
मौसम विशेषज्ञों ने चेताया है कि ला नीना के कारण पड़ने वाली लम्बी ठंड रबी सीजन की फसलों पर सीधा प्रहार कर सकती है।
संभावित असर:
पाले की वजह से गेहूं, सरसों, चना, मटर, आलू जैसी फसलें खराब हो सकती हैं
लगातार ठंड से पौधों का विकास रुक सकता है
नमी और ठंड के कारण फफूंदी और कीट रोगों की आशंका बढ़ सकती है
किसानों को बचाव के लिए सिंचाई, धुआं और फसल कवरिंग जैसे उपाय अपनाने पड़ेंगे
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तापमान लगातार नीचे रहता है तो उत्पादन पर बड़ा असर पड़ सकता है और इसका सीधा असर बाज़ार से लेकर आम आदमी की जेब तक महसूस किया जाएगा।
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