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हर 8 मिनट में एक बच्चा लापता? सुप्रीम कोर्ट ने जताई गहरी चिंता, गोद लेने की प्रक्रिया को सरल बनाने का नि

Published on: November 19, 2025
A child goes missing every 8 minutes

द देवरिया न्यूज़/नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने देश में बच्चों की सुरक्षा और गोद लेने की जटिल प्रक्रियाओं को लेकर गंभीर चिंता जाहिर की है। मंगलवार को उच्चतम न्यायालय ने एक मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि अगर वाकई देश में हर आठ मिनट में एक बच्चा लापता हो रहा है, तो यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि वह गोद लेने की वर्तमान प्रणाली को सरल और पारदर्शी बनाए, ताकि अवैध तरीकों का इस्तेमाल रुक सके और बच्चे सुरक्षित रहें।


“हर आठ मिनट में एक बच्चा गायब”—सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “मैंने अखबार में पढ़ा है कि देश में हर आठ मिनट में एक बच्चा लापता हो जाता है। मुझे नहीं पता कि यह सच है या नहीं, लेकिन यह एक गंभीर मुद्दा है।”

अदालत ने माना कि देश में गोद लेने की प्रक्रिया इतनी जटिल और लंबी है कि लोग अवैध तरीकों से बच्चे गोद लेने लगते हैं, जिससे तस्करी और अपहरण के खतरे बढ़ जाते हैं। अदालत ने कहा कि जब तक गोद लेने की प्रक्रिया सहज और सुगम नहीं होगी, ऐसे मामले बढ़ते रहेंगे।


नोडल अधिकारी की नियुक्ति पर केंद्र को 9 दिसंबर तक का समय

केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने न्यायालय से कहा कि लापता बच्चों के मामलों को देखने के लिए हर राज्य में नोडल अधिकारी नियुक्त करने हेतु सरकार को छह सप्ताह का समय चाहिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इतना लंबा समय देने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया कि केंद्र 9 दिसंबर तक प्रक्रिया पूरी करे, ताकि लापता बच्चों के मामलों में त्वरित कार्रवाई संभव हो पाए।


अक्टूबर में भी दिए गए थे निर्देश

यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर केंद्र को कार्रवाई करने को कहा है।
14 अक्टूबर को भी पीठ ने केंद्र से कहा था कि:

  • सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में
    लापता बच्चों के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त किए जाएँ

  • मिशन वात्सल्य पोर्टल पर उनके नाम और संपर्क विवरण प्रकाशित किए जाएँ

  • किसी भी लापता बच्चे की शिकायत मिलने पर
    तुरंत संबंधित अधिकारी को सूचना भेजी जाए

अदालत ने कहा था कि राज्यों के बीच समन्वय की कमी लापता बच्चों को ढूंढने की प्रक्रिया को बेहद धीमा कर देती है।


लापता बच्चों के लिए विशेष ऑनलाइन पोर्टल का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी केंद्र को निर्देश दिया था कि गृह मंत्रालय की निगरानी में
एक समर्पित ऑनलाइन पोर्टल बनाया जाए, जो पूरे देश में लापता बच्चों की जानकारी, जांच और समन्वय का केंद्र बने।

अदालत ने सुझाव दिया था कि:

  • हर राज्य से पोर्टल पर एक समर्पित अधिकारी नियुक्त हो

  • यही अधिकारी लापता बच्चों से जुड़े डेटा, जांच की स्थिति और शिकायतों पर निगरानी रखे

  • जानकारी रीयल-टाइम में साझा की जाए ताकि बच्चों को जल्द से जल्द खोजा जा सके


एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में उठाया था मुद्दा

मामला मूल रूप से एनजीओ गुरिया स्वयंसेवी संस्थान की याचिका पर चल रहा है।
याचिका में कहा गया था कि:

  • देश में बच्चों के अपहरण और तस्करी के अनेक मामले अनसुलझे हैं

  • ‘खोया-पाया पोर्टल’ पर उपलब्ध जानकारी पर राज्यों द्वारा पर्याप्त कार्रवाई नहीं हो रही

  • कई राज्यों के बीच समन्वय की कमी के कारण बच्चों की तस्करी के नेटवर्क पनप रहे हैं

एनजीओ ने उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश के पिछले साल के पाँच मामलों का जिक्र किया, जिसमें नाबालिग लड़कियों और लड़कों का अपहरण कर उन्हें बिचौलियों के जरिए झारखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में ले जाया गया था।


देश की बच्चों की सुरक्षा प्रणाली पर बड़ा सवाल

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों और मीडिया रिपोर्ट ने एक बार फिर देश में बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अगर वाकई हर आठ मिनट में एक बच्चा गायब हो रहा है, तो यह न सिर्फ कानून व्यवस्था की समस्या है, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक ढांचे की कमियों को भी उजागर करता है।

अदालत का मानना है कि:

  • गोद लेने की प्रक्रिया सरल होगी
    → अवैध गोद लेने की घटनाएं कम होंगी

  • नोडल अधिकारी और ऑनलाइन पोर्टल मजबूत होंगे
    → लापता बच्चों का पता लगाने की गति कई गुना बढ़ेगी

  • राज्यों के बीच बेहतर समन्वय
    → तस्करी के नेटवर्क पर लगाम लगाने में मदद करेगा

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में देरी या लापरवाही किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं होगी। 9 दिसंबर तक नोडल अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश और ऑनलाइन पोर्टल की मांग इस बात का संकेत है कि शीर्ष अदालत चाहती है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस मुद्दे को प्राथमिकता दें। अगली सुनवाई में यह देखना अहम होगा कि केंद्र ने कोर्ट के निर्देशों पर क्या प्रगति की है और क्या लापता बच्चों की खोज और गोद लेने की प्रक्रिया में कोई ठोस सुधार लागू किया गया है।


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