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न्यायिक सेवाओं में 60% महिलाएं मेरिट के आधार पर: सुप्रीम कोर्ट ने कहा—आरक्षण नहीं, योग्यता से हासिल की सफलता

Published on: October 14, 2025
60% women in judicial services

द देवरिया न्यूज़ , नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को देश में न्यायिक सेवाओं में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी की सराहना करते हुए कहा कि अब लगभग 60 फीसदी न्यायिक अधिकारी महिलाएं हैं, और यह उपलब्धि उन्होंने आरक्षण नहीं, बल्कि अपनी योग्यता (मेरिट) के बल पर हासिल की है।

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक याचिका की सुनवाई के दौरान की, जिसमें देशभर की अदालतों और बार संघों में महिला वकीलों को प्रोफेशनल चैम्बर (केबिन) आवंटित करने के लिए एक समान और लैंगिक संवेदनशील नीति बनाने की मांग की गई थी।

केंद्र और बार काउंसिल को नोटिस

शीर्ष अदालत ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI), सुप्रीम कोर्ट के सचिव और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है। याचिकाकर्ता भक्ति पसरीजा और अन्य महिला वकीलों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सोनिया माथुर ने पैरवी की।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि फिलहाल केवल रोहिणी कोर्ट में ही महिलाओं के लिए चैम्बर आवंटन में 10 फीसदी आरक्षण लागू है, जबकि देश के अन्य न्यायालयों और बार एसोसिएशनों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।

“महिलाएं अपनी योग्यता से आगे बढ़ रही हैं” — जस्टिस सूर्यकांत

जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा,

“हमने कई बार यह बात कही है कि न्यायिक सेवाओं में महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। आज लगभग 60 प्रतिशत महिला अधिकारी अपनी योग्यता के दम पर सेवाओं में शामिल हो रही हैं, न कि आरक्षण की वजह से। जब महिलाएं योग्यता से सब कुछ हासिल कर सकती हैं, तो फिर किसी विशेष सुविधा या आरक्षण की मांग क्यों की जाए?”

उन्होंने यह भी कहा कि इस संदर्भ में महिलाओं के लिए विशेष चैम्बर आवंटन की मांग कुछ विरोधाभासी लगती है।

चैम्बर प्रणाली पर सवाल

जस्टिस सूर्यकांत ने इस दौरान “चैम्बर प्रणाली” पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत रूप से वे इस प्रणाली के पक्ष में नहीं हैं।

“इसके बजाय हमें एक क्यूबिकल सिस्टम अपनाना चाहिए, जिसमें वकील और कर्मचारी खुले हॉल में अपने-अपने डेस्क पर बैठकर काम करें। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और सहयोग का माहौल बनेगा।”

उन्होंने कहा कि यदि कोर्ट महिला वकीलों को चैम्बर आवंटन में प्राथमिकता देने पर विचार करता है, तो भविष्य में शारीरिक रूप से अक्षम वकीलों या अन्य समूहों द्वारा भी इसी तरह की मांगें सामने आ सकती हैं।

“महिला वकीलों की सुविधाओं का ध्यान जरूरी” — जस्टिस बागची

हालांकि, जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि महिला वकीलों, विशेषकर नई पीढ़ी की जरूरतों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि कई बार महिलाएं अपने बच्चों की देखभाल के कारण पेशे से दूर हो जाती हैं, इसलिए अदालत परिसरों में उन्हें आवश्यक सुविधाएं मिलनी चाहिए।

“हमारे पास ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां युवा महिला वकीलों को काम और परिवार के बीच संतुलन बनाने में कठिनाई होती है। अदालत परिसरों में क्रेच, अलग वॉशरूम और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना जरूरी है।”

“50 साल आगे की जरूरतों को ध्यान में रखकर बना है नया सुप्रीम कोर्ट परिसर”

जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट की नई इमारत में वकीलों के लिए जो जगह तैयार की गई है, वह आने वाले 50 वर्षों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बनाई गई है। उन्होंने कहा कि इस परिसर में सभी वकीलों के लिए समान कार्यस्थल और बेहतर सुविधाओं की व्यवस्था की जा रही है।

याचिकाकर्ताओं की दलील

याचिका दाखिल करने वाली महिला वकीलों का कहना है कि वे 15 से 25 वर्षों से इस पेशे में कार्यरत हैं, लेकिन अब तक उन्हें कोई स्थायी चैम्बर या कार्यस्थल आवंटित नहीं किया गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) की मौजूदा चैम्बर आवंटन नीति में महिलाओं के लिए कोई आरक्षण या प्राथमिकता नहीं है, जिससे लंबे समय से कार्यरत महिला अधिवक्ताओं को असुविधा का सामना करना पड़ता है।

कोर्ट की टिप्पणी बनी चर्चा का विषय

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कि “महिलाएं मेरिट से आगे बढ़ रही हैं, न कि आरक्षण से” कानूनी और सामाजिक दोनों ही हलकों में चर्चा का विषय बन गई है। एक ओर इसे महिलाओं की बढ़ती योग्यता और आत्मनिर्भरता की स्वीकृति माना जा रहा है, तो वहीं कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि कानूनी पेशे में अभी भी लैंगिक संतुलन और सुविधाओं की दिशा में लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

अब सभी की नजर इस पर है कि केंद्र सरकार और बार काउंसिल ऑफ इंडिया सुप्रीम कोर्ट के नोटिस पर क्या जवाब दाखिल करते हैं और क्या देशभर में महिला वकीलों के लिए कोई एकीकृत, लैंगिक-संवेदनशील नीति लागू हो पाएगी।


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