आयुर्वेद में भी उपवास को त्रिदोष — वात, पित्त और कफ — के संतुलन का साधन माना गया है। यही तीनों तत्व शरीर में असंतुलन पैदा करने पर रोगों का कारण बनते हैं। उपवास के दौरान शरीर को पाचन कार्य से विश्राम मिलता है और विषैले तत्व बाहर निकलते हैं। इससे न केवल शारीरिक स्वास्थ्य सुधरता है बल्कि मन में एकाग्रता और शांति का भाव भी बढ़ता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक समय देवता दैत्य मुर के अत्याचारों से त्रस्त हो गए थे। भगवान विष्णु ने उसकी सेना से वर्षों तक युद्ध किया। विश्राम के क्षणों में उनके शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई, जिसने मुर दैत्य का वध किया। भगवान विष्णु ने उस शक्ति को “एकादशी” नाम देकर वरदान दिया कि जो मनुष्य इस दिन व्रत करेगा, उसे समस्त पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होगी। इसी कारण इस तिथि को “उत्पन्ना एकादशी” कहा जाता है।
मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को यह व्रत किया जाता है। इस दिन प्रातः स्नान के बाद भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा पुष्प, धूप, जल और तुलसी पत्र से की जाती है। व्रतधारी को दशमी की रात्रि से ही अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन पितृ तर्पण, दान-पुण्य और पीपल वृक्ष में जल अर्पण करने से आयु, सौभाग्य और आरोग्य की प्राप्ति होती है।
श्रीमद्भागवत में वर्णित कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था कि जो व्यक्ति श्रद्धा और विधिपूर्वक उत्पन्ना एकादशी का व्रत करता है, उसे मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। यह व्रत केवल धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि आत्मिक उत्थान का भी मार्ग है।
वास्तव में, उत्पन्ना एकादशी विज्ञान, योग और आस्था का ऐसा संगम है जो व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक तीनों स्तरों पर संतुलित करता है। यह दिन आत्मशुद्धि, संयम और साधना के माध्यम से जीवन में नवचेतना और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने का अवसर प्रदान करता है।