द देवरिया न्यूज़,वॉशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक बयान दे रहे हैं। ट्रंप का कहना है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम है और अगर अमेरिका ने वहां कदम नहीं उठाए, तो रूस और चीन अपना प्रभाव बढ़ा सकते हैं। हालांकि, हकीकत यह है कि अमेरिकी सेना बीते सात दशक से भी अधिक समय से ग्रीनलैंड में मौजूद रही है और शीत युद्ध के दौर में यह द्वीप अमेरिकी परमाणु रणनीति का अहम केंद्र था।
दरअसल, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद डेनमार्क ने आधिकारिक तौर पर यह नीति अपनाई थी कि शांति काल में उसकी जमीन पर परमाणु हथियार नहीं रखे जाएंगे। लेकिन पर्दे के पीछे डेनमार्क ने अमेरिका को ग्रीनलैंड में परमाणु हथियार रखने की मौन अनुमति दे दी। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने यहां कई सैन्य ठिकाने बनाए, जिनमें लड़ाकू विमान, रणनीतिक बॉम्बर, मिसाइल डिफेंस सिस्टम और परमाणु हथियार तक तैनात किए गए।
1951 में अमेरिका और डेनमार्क के बीच हुए समझौते के बाद वॉशिंगटन को ग्रीनलैंड के क्षेत्र और हवाई क्षेत्र तक लगभग पूरी पहुंच मिल गई। इसके बाद 1953 में ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में थुले मिलिट्री बेस का निर्माण शुरू हुआ। 1957 में गुपचुप तरीके से अमेरिका को यहां परमाणु हथियार रखने की अनुमति दी गई, जो डेनमार्क की घोषित नीति के खिलाफ था। 1958 से 1965 के बीच अमेरिका ने थुले एयरबेस पर 48 परमाणु हथियार तैनात किए।
इसी दौर में अमेरिका ने परमाणु हथियारों से लैस बमवर्षक विमानों की नियमित उड़ानें शुरू कीं। इसका मकसद सोवियत संघ के संभावित अचानक हमले से बचाव करना था। लेकिन 21 जनवरी 1968 को यह रणनीति एक बड़े हादसे में बदल गई, जब अमेरिकी वायुसेना का B-52G स्ट्रैटोफोर्ट्रेस बॉम्बर चार परमाणु बमों के साथ ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिमी इलाके में समुद्री बर्फ पर क्रैश हो गया।
बताया जाता है कि विमान के हीटिंग सिस्टम में आग लगने के बाद कॉकपिट धुएं से भर गया। इमरजेंसी लैंडिंग संभव न होने पर क्रू ने विमान से बाहर कूदने का फैसला किया। सात में से छह क्रू सदस्य सुरक्षित बाहर निकल आए, जबकि एक की मौत हो गई। हादसे में परमाणु बम टूट गए और रेडियोएक्टिव प्लूटोनियम बर्फीले इलाके में फैल गया। हालांकि, कोई परमाणु विस्फोट नहीं हुआ।
इस हादसे के बाद बड़े पैमाने पर सफाई अभियान चलाया गया और अमेरिका को ग्रीनलैंड के ऊपर परमाणु उड़ानें रोकनी पड़ीं। डेनमार्क के दबाव में अमेरिका ने न्यूक्लियर मलबा हटाने की प्रक्रिया शुरू की, लेकिन कई विशेषज्ञों का दावा है कि एक परमाणु वॉरहेड आज भी ग्रीनलैंड की बर्फीली चादरों के नीचे कहीं दबा हुआ है।
आज, जब ट्रंप ग्रीनलैंड को लेकर फिर से सख्त रुख अपना रहे हैं, तो यह इतिहास याद दिलाता है कि यह द्वीप केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि परमाणु राजनीति और शीत युद्ध के खतरनाक अध्यायों का भी गवाह रहा है।
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