द देवरिया न्यूज़ : इस्लामाबाद एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीन, रूस, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान पर गुप्त भूमिगत परमाणु परीक्षण करने का आरोप लगाने के बाद पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर सफाई दी है। एक वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारी ने कहा—
“पाकिस्तान पहला देश नहीं था जिसने परमाणु परीक्षण किया, और न ही हम इसे दोबारा शुरू करने वाले पहले देश होंगे।”
हालांकि पाकिस्तान ने परीक्षण संबंधी आरोपों से पल्ला झाड़ लिया है, लेकिन उसने अनजाने में ही दुनिया का ध्यान एक बार फिर अपने परमाणु कार्यक्रम की ओर खींच लिया। इसके बाद यह सवाल फिर उठ खड़ा हुआ कि—
प्रतिबंधों, आर्थिक संकट और तकनीकी पिछड़ेपन से जूझने वाला पाकिस्तान आखिर कैसे परमाणु शक्ति बन गया?
कई विशेषज्ञ दावा करते हैं कि पाकिस्तान को सीधे या परोक्ष रूप से अमेरिका, चीन और पश्चिमी नेटवर्क से मदद मिली, जिसने उसे प्रतिबंधों के बावजूद बम बनाने में सक्षम बनाया।
भुट्टो का ‘प्रोजेक्ट-706’ और परमाणु महत्वाकांक्षा
1970 के दशक में प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने दृढ़ता के साथ पाकिस्तान को परमाणु राष्ट्र बनाने का फैसला लिया। 1974 में भारत के पहले परमाणु परीक्षण “स्माइलिंग बुद्ध” के बाद भुट्टो ने कहा था—
“हम घास खाएंगे, फिर भी परमाणु बम बनाएंगे।”
भुट्टो ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) में काम कर चुके इंजीनियर मुनीर अहमद खान को पाकिस्तान एटॉमिक एनर्जी कमिशन (PAEC) का प्रमुख बनाकर ‘प्रोजेक्ट-706’ की नींव रखी—यही पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम का गुप्त नाम था।
शुरुआत में पाकिस्तान ने प्लूटोनियम रिएक्टर के जरिए हथियार बनाने की कोशिश की, लेकिन अमेरिका और कनाडा के प्रतिबंधों से यह रास्ता बंद हो गया।
अब्दुल कादिर खान—जिसने बदल दी पाकिस्तान की किस्मत
इस मोड़ पर एक ऐसा नाम उभरा जिसने पाकिस्तान को बम बनाने का “शॉर्टकट” दे दिया—
अब्दुल कादिर खान (A.Q. Khan)
1970 के दशक में A.Q. खान यूरोप के URENCO में मेटलर्जिस्ट थे, जहाँ उन्हें अल्ट्रा-सीक्रेट यूरेनियम एनरिचमेंट तकनीक तक पहुंच मिली। कहा जाता है कि:
उन्होंने यूरोप से डिज़ाइन, ड्रॉइंग और टॉप-सीक्रेट दस्तावेज़ चुराकर पाकिस्तान ले आए।
उनके पास पूरी सप्लाई-चेन नेटवर्क की सूची भी थी, जिससे सेंट्रीफ्यूज बनाने के लिए उपकरण जुटाए जा सके।
1975 में पाकिस्तान लौटते ही भुट्टो ने उन्हें कहूटा में “खान रिसर्च लैबोरेटरी” का प्रमुख बना दिया।
1980 के दशक के मध्य तक पाकिस्तान के पास उच्च संवर्धित यूरेनियम तैयार था—जो परमाणु बम की सबसे प्रमुख सामग्री है।
नीदरलैंड की अदालत में उन पर जासूसी का केस भी चला, लेकिन तकनीकी कारणों से मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
क्या अमेरिका ने जानबूझकर पाकिस्तान को दी ‘राजनीतिक छूट’?
विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान को कई मोर्चों पर मदद मिली:
1. यूरोपीय काला बाजार नेटवर्क
जर्मनी, स्विट्जरलैंड, मलेशिया और दुबई से पाकिस्तान ने—
वैक्यूम पंप
उच्च-ग्रेड मार्जिंग स्टील
संवेदनशील इलेक्ट्रॉनिक उपकरण
सेंट्रीफ्यूज पार्ट्स
खान की “ब्लैक नेटवर्क” कंपनियों के जरिए खरीदे।
2. चीन की खुली मदद
अमेरिकी खुफिया दस्तावेज़ बताते हैं कि—
चीन ने पाकिस्तान को परीक्षित परमाणु हथियार की डिज़ाइन (CHIC-4) दी।
5,000 रिंग मैग्नेट भेजे, जो सेंट्रीफ्यूज स्पीड स्थिर रखने के लिए जरूरी थे।
यह सब उस समय हुआ जब अमेरिकी CIA को जानकारी थी, लेकिन पाकिस्तान पर कार्रवाई नहीं की गई।
3. सऊदी और लीबिया का पैसा
सऊदी अरब ने पाकिस्तान को भारी फंडिंग दी।
लीबिया ने भी शुरुआती वर्षों में आर्थिक सहायता दी।
अमेरिका ने क्यों नहीं रोका पाकिस्तान को?
1980 के दशक में सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान पाकिस्तान अमेरिका का सबसे बड़ा सहयोगी था।
अमेरिका ने हर साल प्रमाणित किया कि “पाकिस्तान परमाणु बम नहीं बना रहा”, जबकि हकीकत इसके उलट थी।
असल में, US ने पाकिस्तान की परमाणु महत्वाकांक्षा को नजरअंदाज किया, क्योंकि—
उसे सोवियत संघ के खिलाफ पाकिस्तान की रणनीतिक जरूरत थी।
अफगान युद्ध में अमेरिका को पाकिस्तान की जमीन, खुफिया एजेंसियों और सेना का पूरा सहयोग चाहिए था।
1998: परमाणु शक्ति बनने की आधिकारिक घोषणा
भारत के पोखरण-II परीक्षण के मात्र दो सप्ताह बाद, पाकिस्तान ने चागई पहाड़ियों में 5 परमाणु विस्फोट कर खुद को दुनिया का सातवां आधिकारिक परमाणु देश घोषित कर दिया। इस कदम ने साफ कर दिया कि प्रतिबंधों और आर्थिक संकट के बावजूद पाकिस्तान दशकों पहले ही परमाणु क्षमता हासिल कर चुका था।
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