द देवरिया न्यूज़ /पटना। अपराध की दुनिया में कोई भी कितनी शक्ति, क्रूरता या आतंक क्यों न कायम कर ले—अंजाम अक्सर धोखे, लालच और प्रेम के उलझे जाल में ही मिलता है। बिहार के मुंगेर–लखीसराय दियारा में आतंक की काली इबारत लिखने वाले कुख्यात अपराधी कैलू यादव का अंतिम अध्याय भी कुछ ऐसा ही था, जिसकी पटकथा हुस्न की परछाइयों में तैयार हुई। मौत जब आई तो उसी रास्ते से, जिसके लिए कैलू ने सोचा भी नहीं था—एक युवती हुस्न बानो के कारण।
कौन था कैलू यादव? दियारा का खून-खौफ का सम्राट
मुंगेर दियारा में जन्मा कैलू यादव शुरुआत में एक आम लड़का था, लेकिन दियारा क्षेत्र के आपराधिक समीकरणों ने उसे अपराध की दुनिया में धकेल दिया।
लखीसराय-दियारा कनेक्शन की मजबूरी—
पुलिस दबिश के समय मुंगेर के अपराधी लखीसराय में,
और लखीसराय के अपराधी मुंगेर में शरण लेते थे।
इसी दौरान कैलू की मुलाकात हुई कुख्यात गैंगस्टर अधिक यादव से, जो हत्या के वीभत्स तरीके के कारण कुख्यात था—
पीड़ित का पेट फाड़कर गंगा में बहा देना, जिससे शरीर डूब जाए और सबूत न मिले।
गुरु अधिक यादव था, लेकिन क्रूरता में चेला कैलू उससे भी आगे निकल गया। उसके गिरोह में “कुट्टी-कुट्टी काटने” जैसी भाषा आम बात थी। कुछ ही वर्षों में कैलू ने मुंगेर–लखीसराय दियारा से अपना साम्राज्य बढ़ाते हुए भागलपुर से पटना तक आतंक की रेखा खींच दी।
दुलारचंद यादव से गठजोड़—और फिर जड़ें जमाने की तैयारी
पटना की ओर बढ़ते सफर में कैलू की दोस्ती और फिर साझेदारी हुई दुलारचंद यादव से। दोनों ने मिलकर आतंक का नया नक्शा तैयार किया। गैंग, हथियार और धमकी—सब कुछ तेजी से फैलने लगा।
लेकिन इसी बीच कहानी में प्रवेश हुआ हुस्न बानो का, जिसने आगे चलकर दोनों के रिश्तों को तहस-नहस कर दिया।
हुस्न बानो का एंट्री: प्रेम और धोखे की परछाइयाँ
पुलिस की बढ़ती दबिश के चलते कैलू और दुलारचंद कुछ समय के लिए धनबाद में छिपने लगे। यहीं कैलू की मुलाकात हुई एक कॉलेज गर्ल हुस्न बानो से।
कैलू उस पर फ़िदा हुआ, मुलाकातें प्रेम में बदलीं और आखिरकार कैलू ने उससे निकाह कर लिया।
लेकिन हुस्न बानो को पहली मुलाकात में दिल दुलारचंद यादव ने भी दे दिया था। पत्रकार बीरेंद्र सिंह के अनुसार—
“हुस्न बानो किसे चाहती थी, यह कभी साफ़ नहीं हुआ। लेकिन दुलारचंद का प्रेम उससे छुप न सका।”
यह प्रेम-त्रिकोण ही आगे चलकर खूनी बदले का कारण बना।
हुस्न बानो को अगवा कर गया दुलारचंद का गिरोह
दुलारचंद के गुर्गों ने हुस्न बानो को धनबाद से अगवा कर लिया।
जब कैलू को यह जानकारी मिली, तो उसने ऐलान कर दिया—
“अब दुलारचंद का अंत तय है।”
कैलू ने लखीसराय के तारतर गांव में हमला करने का प्लान बनाया।
5 जून 1989: पांच निर्दोषों की हत्या, दुलारचंद बच निकला
निर्धारित तारीख 5 जून 1989 को कैलू यादव भारी हथियारों के साथ तारतर गांव पहुंचा।
लेकिन दुलारचंद वहां नहीं मिला।
गुस्से में आकर कैलू ने
✅ शिव साहू
✅ टूना सहनी
✅ गनौरी महतो
✅ बेलदार
✅ सकल महतो
जैसे पांच निर्दोष लोगों की हत्या कर दी।
इस घटना के बाद दुलारचंद ने कांग्रेस के नेताओं से संबंध मजबूत कर अपना गैंग और प्रभाव बढ़ा लिया, जबकि कैलू पर दबाव बढ़ता गया।
कैलू यादव का अंत—एक रहस्य, पर अंतिम मुहर 16 मार्च 1992 को
कैलू की मौत की खबरें कई बार फैलती रहीं, लेकिन पुष्टि नहीं होती थी।
अंततः 16 मार्च 1992 को उसकी हत्या की पुष्टि हुई।
किसने मारा?
कहां मारा?
कैसे मारा?
इन सवालों का जवाब कभी नहीं मिला।
कई लोगों का मानना है कि प्रेम और धोखे के इस खेल में हुस्न बानो की भूमिका रहस्यमय रही।
दूसरे कहते हैं कि यह गैंगवार का नतीजा था।
कैलू की मौत के बाद उसके भाई जीवन यादव उर्फ सरदार ने परिवार की आपराधिक विरासत संभाली और दियारा एक नए आतंक का गवाह बना।
अपराध का अंत अक्सर भीतर से होता है
कैलू यादव की कहानी बताती है कि—
अपराधी का अंत अक्सर उसी दुनिया से होता है जिसे वह खुद बनाता है—कभी सत्ता की लड़ाई, कभी विश्वासघात और कई बार प्रेम की आड़ में धोखा।
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